श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिये विप्रेन्द्रगण! आपलोग रामायणकी अमृतमयी कथा सुनिये। श्रोताओंके लिये यह सर्वोत्तम श्रवणीय वस्तु है और पवित्रोंमें भी परम उत्तम है॥ ३८ ॥
दुःस्वप्नको नष्ट करनेवाली यह कथा धन्य है। इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त होकर इसका एक श्लोक या आधा श्लोक भी पढ़ता है, वह तत्काल ही करोड़ों उपपातकोंसे छुटकारा पा जाता है। यह गुह्यसे भी गुह्यतम वस्तु है, इसे सत्पुरुषोंको ही सुनाना चाहिये॥ ३९-४० ॥
भगवान् श्रीरामके मन्दिरमें अथवा किसी पुण्यक्षेत्रमें, सत्पुरुषोंकी सभामें रामायणकथाका प्रवचन करना चाहिये। जो ब्रह्मद्रोही, पाखण्डपूर्ण आचारमें तत्पर तथा लोगोंको ठगनेवाली वृत्तिसे युक्त हैं, उन्हें यह परम उत्तम कथा नहीं सुनानी चाहिये॥ ४१ १/२ ॥
जो काम आदि दोषोंका त्याग कर चुके हैं, जिनका मन रामभक्तिमें अनुरक्त रहता है तथा जो गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर हैं, उन्हींके समक्ष यह मोक्षकी साधनभूत कथा बाँचनी चाहिये॥ ४२ १/२ ॥
श्रीराम सर्वदेवमय माने गये हैं। वे आर्त प्राणियोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं तथा श्रेष्ठ भक्तोंपर सदा ही स्नेह रखते हैं। वे भगवान् भक्तिसे ही संतुष्ट होते हैं, दूसरे किसी उपायसे नहीं॥ ४३ १/२ ॥
मनुष्य विवश होकर भी उनके नामका कीर्तन अथवा स्मरण कर लेनेपर समस्त पातकोंसे मुक्त हो परमपदका भागी होता है॥ ४४ १/२ ॥
महात्माओ! भगवान् मधुसूदन संसाररूपी भयंकर एवं दुर्गम वनको भस्म करनेके लिये दावानलके समान हैं। वे अपना स्मरण करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंका शीघ्र ही नाश कर देते हैं॥ ४५ १/२ ॥
इस पवित्र काव्यके प्रतिपाद्य विषय वे ही हैं, अतः यह परम उत्तम काव्य सदा ही श्रवण करनेयोग्य है। इसका श्रवण अथवा पाठ करनेसे यह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४६ १/२ ॥
जिसकी श्रीराम-रसमें प्रीति एवं भक्ति है, वही सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें निपुण और कृतकृत्य है॥