श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो वाचकको रामायणकी पुस्तक देता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है; जहाँ जाकर उसे कभी शोक नहीं करना पड़ता॥ २५ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सनत्कुमार! रामायणकी नवाह कथा सुननेसे यजमानको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो। पञ्चमी तिथिको रामायणकी अमृतमयी कथाको आरम्भ करके उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ २६ १/२ ॥
यदि दो बार यह कथा श्रवण की गयी तो श्रोताको पुण्डरीकयज्ञका फल मिलता है। जो जितेन्द्रिय पुरुष व्रतधारणपूर्वक रामायण-कथाको श्रवण करता है, वह दो अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है। मुनिवरो! जिसने चार बार इस कथाका श्रवण किया है, वह आठ अग्निष्टोमके परम पुण्यफलका भागी होता है॥ २७— २९ ॥
जिस महामनस्वी पुरुषने पाँच बार रामायणकथाश्रवणका व्रत पूरा कर लिया है, वह अत्यग्निष्टोमयज्ञके द्विगुण पुण्य-फलका भागी होता है॥ ३० ॥
जो एकाग्रचित्त होकर इस प्रकार छः बार रामायणकथाके व्रतका अनुष्ठान पूरा कर लेता है, वह अग्निष्टोमयज्ञके आठगुने फलका भागी होता है॥ ३१ ॥
मुनीश्वरो! स्त्री हो या पुरुष, जो आठ बार रामायणकथाको सुन लेता है, वह नरमेधयज्ञका पाँचगुना फल पाता है॥ ३२ ॥
जो स्त्री या पुरुष नौ बार इस व्रतका आचरण करता है, उसे तीन गोमेध-यज्ञका पुण्यफल प्राप्त होता है॥
जो पुरुष शान्तचित्त और जितेन्द्रिय होकर रामायणयज्ञका अनुष्ठान करता है, वह उस परमानन्दमय धाममें जाता है, जहाँ जाकर उसे कभी शोक नहीं करना पड़ता॥ ३४ ॥
जो प्रतिदिन रामायणका पाठ अथवा श्रवण करता है, गंगा नहाता है और धर्ममार्गका उपदेश देता है; ऐसे लोग संसारसागरसे मुक्त ही हैं, इसमें संशय नहीं है॥
महात्माओ! यतियों, ब्रह्मचारियों तथा प्रवीरोंको भी रामायणकी नवाह कथा सुननी चाहिये॥ ३६ ॥
रामकथाको अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य महान् तेजसे उद्दीप्त हो उठता है और ब्रह्मलोकमें जाकर वहीं आनन्दका अनुभव करता है॥ ३७ ॥