भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 98

व्रती पुरुष आवाहन, आसन, गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रसे भक्तिपरायण होकर पूजन करे॥ १३ ॥

सम्पूर्ण पापोंकी निवृत्तिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार एक, दो या तीन बार प्रयत्नपूर्वक होम करे॥

इस प्रकार जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर रामायणकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है; जहाँसे लौटकर वह फिर इस संसारमें नहीं आता॥ १५ ॥

जो रामायणसम्बन्धी व्रतको धारण करनेवाला तथा धर्मात्मा है, वह श्रेष्ठ पुरुष चाण्डाल अथवा पतित मनुष्यका वस्त्र और अन्नसे भी सत्कार न करे॥ १६ ॥

जो नास्तिक, धर्ममर्यादाको तोड़नेवाले, परनिन्दक और चुगलखोर हैं, उनका रामायणव्रतधारी पुरुष वाणीमात्रसे भी आदर न करे॥ १७ ॥

जो पतिके जीवित रहते ही परपुरुषके समागमसे माताद्वारा उत्पन्न किया जाता है, उस जारज पुत्रको ‘कुण्ड’ कहते हैं। ऐसे कुण्डके यहाँ जो भोजन करता है, जो गीत गाकर जीविका चलाता है, देवतापर चढ़ी हुई वस्तुका उपभोग करनेवाले मनुष्यका अन्न खाता है, वैद्य है, लोगोंकी मिथ्या प्रशंसामें कविता लिखता है, देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करता है, पराये अन्नका लोभी है और पर-स्त्रीमें आसक्त रहता है, ऐसे मनुष्यका भी रामायणव्रती पुरुष वाणीमात्रसे भी आदर न करे॥ १८-१९ ॥

इस प्रकार दोषोंसे दूर एवं शुद्ध होकर जितेन्द्रिय एवं सबके हितमें तत्पर रहते हुए जो रामायणका आश्रय लेता है, वह परमसिद्धिको प्राप्त होता है॥ २० ॥

गंगाके समान तीर्थ, माताके तुल्य गुरु, भगवान् विष्णुके सदृश देवता तथा रामायणसे बढ़कर कोई उत्तम वस्तु नहीं है॥ २१ ॥

वेदके समान शास्त्र, शान्तिके समान सुख, शान्तिसे बढ़कर ज्योति तथा रामायणसे उत्कृष्ट कोई काव्य नहीं है॥ २२ ॥

क्षमाके सदृश बल, कीर्तिके समान धन, ज्ञानके सदृश लाभ तथा रामायणसे बढ़कर कोई उत्तम ग्रन्थ नहीं है॥ २३ ॥

रामायणकथाके अन्तमें वेदज्ञ वाचकको दक्षिणासहित गौका दान करे। उन्हें रामायणकी पुस्तक तथा वस्त्र और आभूषण आदि दे॥ २४ ॥