भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1241

इक्ष्वाकुकुलके सिंह लक्ष्मणने निकट जाकर वानरराज सुग्रीवकी विशाल पुरी किष्किन्धा देखी, जो पहाड़ोंके बीचमें बसी हुई थी। वानरसेनासे व्याप्त होनेके कारण वह पुरी दूसरोंके लिये दुर्गम थी॥ १६ ॥

उस समय लक्ष्मणके ओष्ठ सुग्रीवके प्रति रोषसे फड़क रहे थे। उन्होंने किष्किन्धाके पास बहुतेरे भयंकर वानरोंको देखा जो नगरके बाहर विचर रहे थे॥ १७ ॥

उन वानरोंके शरीर हाथियोंके समान विशाल थे। उन समस्त वानरोंने पुरुषप्रवर लक्ष्मणको देखते ही पर्वतके अंदर विद्यमान सैकड़ों शैल-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठा लिये॥ १८ ॥

उन सबको हथियार उठाते देख लक्ष्मण दूने क्रोधसे जल उठे, मानो जलती आगमें बहुत-सी सूखी लकड़ियाँ डाल दी गयी हों॥ १९ ॥

क्षुब्ध हुए लक्ष्मण काल, मृत्यु तथा प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर दिखायी देने लगे। उन्हें देखकर उन वानरोंके शरीर भयसे काँपने लगे और वे सैकड़ोंकी संख्यामें चारों दिशाओंमें भाग गये॥ २० ॥

तदनन्तर कई श्रेष्ठ वानरोंने सुग्रीवके महलमें जाकर लक्ष्मणके आगमन और क्रोधका समाचार निवेदन किया॥ २१ ॥

उस समय कामके अधीन हुए वानरराज सुग्रीव भोगासक्त हो ताराके साथ थे। इसलिये उन्होंने उन श्रेष्ठ वानरोंकी बातें नहीं सुनीं॥ २२ ॥

तब सचिवकी आज्ञासे पर्वत, हाथी और मेघके समान विशालकाय वानर जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे, नगरसे बाहर निकले॥ २३ ॥

वे सब-के-सब वीर थे। नख और दाँत ही उनके आयुध थे। वे बड़े विकराल दिखायी देते थे। उन सबकी दाढ़ें व्याघ्रोंकी दाढ़ोंके समान थीं और सबके नेत्र खुले हुए थे (अथवा उन सबका वहाँ स्पष्ट दर्शन होता था—कोई छिपे नहीं थे)॥ २४ ॥

किन्हींमें दस हाथियोंके बराबर बल था तो कोई सौ हाथियोंके समान बलशाली थे तथा किन्हीं-किन्हींका तेज (बल और पराक्रम) एक हजार हाथियोंके तुल्य था॥ २५ ॥

हाथमें वृक्ष लिये उन महाबली वानरोंसे व्याप्त हुई किष्किन्धापुरी अत्यन्त दुर्जय दिखायी देती थी। लक्ष्मणने कुपित होकर उस पुरीकी ओर देखा॥ २६ ॥