भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1242

तदनन्तर वे सभी महाबली वानर पुरीकी चहारदीवारी और खाईके भीतरसे निकलकर प्रकटरूपसे सामने आकर खड़े हो गये॥ २७ ॥

आत्मसंयमी वीर लक्ष्मण सुग्रीवके प्रमाद तथा अपने बड़े भाईके महत्त्वपूर्ण कार्यपर दृष्टिपात करके पुनः वानरराजके प्रति क्रोधके वशीभूत हो गये॥ २८ ॥

वे अधिक गरम और लंबी साँस खींचने लगे। उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उस समय पुरुषसिंह लक्ष्मण धूमयुक्त अग्निके समान प्रतीत हो रहे थे॥ २९ ॥

इतना ही नहीं, वे पाँच मुखवाले सर्पके समान दिखायी देने लगे। बाणका फल ही उस सर्पकी लपलपाती हुई जिह्वा जान पड़ता था, धनुष ही उसका विशाल शरीर था तथा वे सर्परूपी लक्ष्मण अपने तेजोमय विषसे व्याप्त हो रहे थे॥ ३० ॥

उस अवसरपर कुमार अङ्गद प्रज्वलित प्रलयाग्नि तथा क्रोधमें भरे हुए नागराज शेषकी भाँति दृष्टिगोचर होनेवाले लक्ष्मणके पास डरते-डरते गये। वे अत्यन्त विषादमें पड़ गये थे॥ ३१ ॥

महायशस्वी लक्ष्मणने क्रोधसे लाल आँखें करके अङ्गदको आदेश दिया—'बेटा! सुग्रीवको मेरे आनेकी सूचना दो। उनसे कहना—शत्रुदमन वीर! श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मण अपने भ्राताके दुःखसे दुःखी होकर आपके पास आये हैं और नगर-द्वारपर खड़े हैं। वानरराज! यदि आपकी इच्छा हो तो उनकी आज्ञाका अच्छी तरह पालन कीजिये। शत्रुदमन वत्स अङ्गद! बस, इतना ही कहकर तुम शीघ्र मेरे पास लौट आओ'॥ ३२—३४ ॥

लक्ष्मणकी बात सुनकर शोकाकुल अङ्गदने पिता सुग्रीवके समीप आकर कहा—'तात! ये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण यहाँ पधारे हैं'॥ ३५ ॥

(अब इसी बातको कुछ विस्तारके साथ कहते हैं—) लक्ष्मणकी कठोर वाणीसे अङ्गदके मनमें बड़ी घबराहट हुई। उनके मुखपर अत्यन्त दीनता छा गयी। उन वेगशाली कुमारने वहाँसे निकलकर पहले वानरराज सुग्रीवके, फिर तारा तथा रुमाके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ३६ ॥

उग्र तेजवाले अङ्गदने पहले तो पिताके दोनों पैर पकड़े फिर अपनी माता ताराके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। तदनन्तर रुमाके दोनों पैर दबाये। इसके बाद पूर्वोक्त बात कही॥ ३७ ॥

किंतु सुग्रीव मदमत्त एवं कामसे मोहित होकर पड़े थे। निद्राने उनके ऊपर पूरा अधिकार जमा लिया था। इसलिये वे जाग न सके॥ ३८ ॥