भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1295

‘कुबेरकी सवारीमें काम आनेवाला सार्वभौम-नामक गजराज अपनी हथिनियोंके साथ उस देशमें सदा घूमता रहता है॥ ३४ १/२ ॥

‘उस सरोवरको लाँघकर आगे जानेपर सूना आकाश दिखायी देगा। उसमें सूर्य, चन्द्रमा तथा तारोंके दर्शन नहीं होंगे। वहाँ न तो मेघोंकी घटा दिखायी देगी और न उनकी गर्जना ही सुनायी पड़ेगी॥ ३५ ॥

‘तथापि उस देशमें ऐसा प्रकाश छाया होगा, मानो सूर्यकी किरणोंसे ही वह प्रकाशित हो रहा है। वहाँ अपनी ही प्रभासे प्रकाशित तपःसिद्ध देवोपम महर्षि विश्राम करते हैं। उन्हींकी अङ्गप्रभासे उस देशमें उजाला छाया रहता है॥ ३६ ॥

‘उस प्रदेशको लाँघकर आगे बढ़नेपर ‘शैलोदा’ नामवाली नदीका दर्शन होगा। उसके दोनों तटोंपर कीचक (वंशीकी-सी ध्वनि करनेवाले) बाँस हैं; यह बात प्रसिद्ध है॥ ३७ ॥

‘वे बाँस ही (साधन बनकर) सिद्ध पुरुषोंको शैलोदाके उस पार ले जाते और वहाँसे इस पार ले आते हैं। जहाँ केवल पुण्यात्मा पुरुषोंका वास है, वह उत्तर कुरुदेश शैलोदाके तटपर ही है॥ ३८ ॥

‘उत्तर कुरुदेशमें नील वैदूर्यमणिके समान हरे-हरे कमलोंके पत्तोंसे सुशोभित सहस्रों नदियाँ बहती हैं, जिनके जल सुवर्णमय पद्मोंसे अलंकृत अनेकानेक पुष्करिणियोंसे मिले हुए हैं॥ ३९ ॥

‘वहाँके जलाशय लाल और सुनहरे कमल-समूहोंसे मण्डित होकर प्रातःकाल उदित हुए सूर्यके समान शोभा पाते हैं॥ ४० ॥

‘बहुमूल्य मणियोंके समान पत्तों और सुवर्णके समान कान्तिमान् केसरोंवाले विचित्र-विचित्र नील कमलोंके द्वारा वहाँका प्रदेश सब ओरसे सुशोभित होता है॥ ४१ ॥

‘वहाँकी नदियोंके तट गोल-गोल मोतियों, बहुमूल्य मणियों और सुवर्णोंसे सम्पन्न हैं। इतना ही नहीं, उन नदियोंके किनारे सम्पूर्ण रत्नोंसे युक्त विचित्र-विचित्र पर्वत भी विद्यमान हैं, जो उनके जलके भीतरतक घुसे हुए हैं। उन पर्वतोंमेंसे कितने ही सुवर्णमय हैं, जिनसे अग्निके समान प्रकाश फैलता रहता है॥ ४२-४३ ॥

‘वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल-फूल लगे रहते हैं और उनपर पक्षी चहकते रहते हैं। वे वृक्ष दिव्य गन्ध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श प्रदान करते हैं तथा प्राणियोंकी सारी मनचाही वस्तुओंकी वर्षा करते रहते हैं॥ ४४ ॥