श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘इनके सिवा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष फलोंके रूपमें नाना प्रकारके वस्त्र, मोती और वैदूर्यमणिसे जटित आभूषण देते हैं, जो स्त्रियों तथा पुरुषोंके भी उपयोगमें आने योग्य होते हैं॥ ४५ ॥
‘दूसरे उत्तम वृक्ष सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक सेवन करने योग्य अच्छे-अच्छे फल देते हैं। अन्यान्य सुन्दर वृक्ष बहुमूल्य मणियोंके समान विचित्र फल उत्पन्न करते हैं॥ ४६ ॥
‘कितने ही अन्य वृक्ष विचित्र बिछौनोंसे युक्त शय्याओंको ही फलोंके रूपमें प्रकट करते हैं, मनको प्रिय लगनेवाली सुन्दर मालाएँ भी प्रस्तुत करते हैं, बहुमूल्य पेय पदार्थ और भाँति-भाँतिके भोजन भी देते हैं तथा रूप और यौवनसे प्रकाशित होनेवाली सद्गुणवती युवतियोंको भी जन्म देते हैं॥ ४७-४८ ॥
‘वहाँ सूर्यके समान कान्तिमान् गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सदा नारियोंके साथ क्रीडाविहार करते हैं॥ ४९ ॥
‘वहाँके सब लोग पुण्यकर्मा हैं, सभी अर्थ और कामसे सम्पन्न हैं तथा सब लोग काम-क्रीडापरायण होकर युवती स्त्रियोंके साथ निवास करते हैं॥ ५० ॥
‘वहाँ निरन्तर उत्कृष्ट हास-परिहासकी ध्वनिसे युक्त गीतवाद्यका मधुर घोष सुनायी देता है, जो समस्त प्राणियोंके मनको आनन्द प्रदान करनेवाला है॥ ५१ ॥
‘वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता। किसीकी भी बुरे कामोंमें प्रीति नहीं होती। वहाँ रहनेसे प्रतिदिन मनोरम गुणोंकी वृद्धि होती है॥ ५२ ॥
‘उस देशको लाँघकर आगे जानेपर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र उपलब्ध होगा। उस समुद्रके मध्यभागमें सोमगिरि नामक एक बहुत ऊँचा सुवर्णमय पर्वत है॥ ५३ ॥
‘जो लोग स्वर्गलोकमें गये हैं, वे तथा इन्द्रलोक और ब्रह्मलोकमें रहनेवाले देवता उस गिरिराज सोमगिरिका दर्शन करते हैं॥ ५४ ॥
‘वह देश सूर्यसे रहित है तो भी सोमगिरिकी प्रभासे सदा प्रकाशित होता रहता है। तपते हुए सूर्यकी प्रभासे जो देश प्रकाशित होते हैं, उन्हींकी भाँति उसे सूर्यदेवकी शोभासे सम्पन्न-सा जानना चाहिये॥ ५५ ॥
‘वहाँ विश्वात्मा भगवान् विष्णु, एकादश रुद्रोंके रूपमें प्रकट होनेवाले भगवान् शंकर तथा ब्रह्मर्षियोंसे घिरे हुए देवेश्वर ब्रह्माजी निवास करते हैं॥ ५६ ॥