श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1727, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर शरभने सोच-विचारकर यह सार्थक बात कही—‘पुरुषसिंह! इस विभीषणके ऊपर शीघ्र ही कोई गुप्तचर नियुक्त कर दिया जाय॥ ४३ ॥
‘सूक्ष्म बुद्धिवाले गुप्तचरको भेजकर उसके द्वारा यथावत्रूपसे उसकी परीक्षा कर ली जाय। इसके बाद यथोचित रीतिसे उसका संग्रह करना चाहिये’॥ ४४ ॥
इसके बाद परम चतुर जाम्बवान्ने शास्त्रीय बुद्धिसे विचार करके ये गुणयुक्त दोषरहित वचन कहे— ॥
‘राक्षसराज रावण बड़ा पापी है। उसने हमारे साथ वैर बाँध रखा है और यह विभीषण उसीके पाससे आ रहा है। वास्तवमें न तो इसके आनेका यह समय है और न स्थान ही। इसलिये इसके विषयमें सब प्रकारसे सशङ्क ही रहना चाहिये’॥ ४६ ॥
तदनन्तर नीति और अनीतिके ज्ञाता तथा वाग्वैभवसे सम्पन्न मैन्दने सोच-विचारकर यह युक्तियुक्त उत्तम बात कही— ॥ ४७ ॥
‘महाराज! यह विभीषण रावणका छोटा भाई ही तो है, इसलिये इससे मधुर व्यवहारके साथ धीरे-धीरे सब बातें पूछनी चाहिये॥ ४८ ॥
‘नरश्रेष्ठ! फिर इसके भावको समझकर आप बुद्धिपूर्वक यह ठीक-ठीक निश्चय करें कि यह दुष्ट है या नहीं। उसके बाद जैसा उचित हो, वैसा करना चाहिये’॥
तत्पश्चात् सचिवोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानजनित संस्कारसे युक्त हनुमान्जीने ये श्रवणमधुर, सार्थक, सुन्दर और संक्षिप्त वचन कहे— ॥ ५० ॥
‘प्रभो! आप बुद्धिमानोंमें उत्तम, सामर्थ्यशाली और वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। यदि बृहस्पति भी भाषण दें तो वे अपनेको आपसे बढ़कर वक्ता नहीं सिद्ध कर सकते॥ ५१ ॥
‘महाराज श्रीराम! मैं जो कुछ निवेदन करूँगा, वह वाद-विवाद या तर्क, स्पर्धा, अधिक बुद्धिमत्ताके अभिमान अथवा किसी प्रकारकी कामनासे नहीं करूँगा। मैं तो कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर जो यथार्थ समझूँगा, वही बात कहूँगा॥ ५२ ॥
‘आपके मन्त्रियोंने जो अर्थ और अनर्थके निर्णयके लिये गुण-दोषकी परीक्षा करनेका सुझाव दिया है, उसमें मुझे दोष दिखायी देता है; क्योंकि इस समय परीक्षा लेना कदापि सम्भव नहीं है॥ ५३ ॥