श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1728, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘विभीषण आश्रय देनेके योग्य हैं या नहीं—इसका निर्णय उसे किसी काममें नियुक्त किये बिना नहीं हो सकता और सहसा उसे किसी काममें लगा देना भी मुझे सदोष ही प्रतीत होता है॥ ५४ ॥
‘आपके मन्त्रियोंने जो गुप्तचर नियुक्त करनेकी बात कही है, उसका कोऽइ प्रयोजन न होनेसे वैसा करनेका कोऽइ युक्तियुक्त कारण नहीं दिखायी देता। (जो दूर रहता हो और जिसका वृत्तान्त ज्ञात न हो, उसीके लिये गुप्तचरकी नियुक्ति की जाती है। जो सामने खड़ा है और स्पष्टरूपसे अपना वृत्तान्त बता रहा है, उसके लिये गुप्तचर भेजनेकी क्या आवश्यकता है)॥ ५५ ॥
‘इसके सिवा जो यह कहा गया है कि विभीषणका इस समय यहाँ आना देश-कालके अनुरूप नहीं है। उसके विषयमें भी मैं अपनी बुद्धिके अनुसार कुछ कहना चाहता हूँ। आप सुनें॥ ५६ ॥
‘उसके यहाँ आनेका यही उत्तम देश और काल है, यह बात जिस तरह सिद्ध होती है, वैसा बता रहा हूँ। विभीषण एक नीच पुरुषके पाससे चलकर एक श्रेष्ठ पुरुषके पास आया है। उसने दोनोंके दोषों और गुणोंका भी विवेचन किया है। तत्पश्चात् रावणमें दुष्टता और आपमें पराक्रम देख वह रावणको छोड़कर आपके पास आ गया है। इसलिये उसका यहाँ आगमन सर्वथा उचित और उसकी उत्तम बुद्धिके अनुरूप है॥ ५७-५८ ॥
‘राजन्! किसी मन्त्रीके द्वारा जो यह कहा गया है कि अपरिचित पुरुषोंद्वारा इससे सारी बातें पूछी जायें। उसके विषयमें मेरा जाँच-बूझकर निश्चित किया हुआ विचार है, जिसे आपके सामने रखता हूँ॥ ५९ ॥
‘यदि कोऽइ अपरिचित व्यक्ति यह पूछेगा कि तुम कौन हो, कहाँसे आये हो? किसलिये आये हो? इत्यादि, तब कोऽइ बुद्धिमान् पुरुष सहसा उस पूछनेवालेपर संदेह करने लगेगा और यदि उसे यह मालूम हो जायगा कि सब कुछ जानते हुए भी मुझसे झूठे ही पूछा जा रहा है, तब सुखके लिये आये हुए उस नवागत मित्रका हृदय कलुषित हो जायगा (इस प्रकार हमें एक मित्रके लाभसे वञ्चित होना पड़ेगा)॥ ६० ॥
‘इसके सिवा महाराज! किसी दूसरेके मनकी बातको सहसा समझ लेना असम्भव है। बीच-बीचमें स्वरभेदसे आप अच्छी तरह यह निश्चय कर लें कि यह साधुभावसे आया है या असाधुभावसे॥ ६१ ॥