श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसकी बातचीतसे भी कभी इसका दुर्भाव नहीं लक्षित होता। इसका मुख भी प्रसन्न है। इसलिये मेरे मनमें इसके प्रति कोई संदेह नहीं है॥ ६२ ॥
‘दुष्ट पुरुष कभी निःशङ्क एवं स्वस्थचित्त होकर सामने नहीं आ सकता। इसके सिवा इसकी वाणी भी दोषयुक्त नहीं है। अतः मुझे इसके विषयमें कोई संदेह नहीं है॥
‘कोई अपने आकारको कितना ही क्यों न छिपाये, उसके भीतरका भाव कभी छिप नहीं सकता। बाहरका आकार पुरुषोंके आन्तरिक भावको बलात् प्रकट कर देता है॥ ६४ ॥
‘कार्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! विभीषणका यहाँ आगमनरूप जो कार्य है, वह देश-कालके अनुरूप ही है। ऐसा कार्य यदि योग्य पुरुषके द्वारा सम्पादित हो तो अपने-आपको शीघ्र सफल बनाता है॥ ६५ ॥
‘आपके उद्योग, रावणके मिथ्याचार, वालीके वध और सुग्रीवके राज्याभिषेकका समाचार जान-सुनकर राज्य पानेकी इच्छासे यह समझ-बूझकर ही यहाँ आपके पास आया है (इसके मनमें यह विश्वास है कि शरणागतवत्सल दयालु श्रीराम अवश्य ही मेरी रक्षा करेंगे और राज्य भी दे देंगे)। इन्हीं सब बातोंको दृष्टिमें रखकर विभीषणका संग्रह करना—उसे अपना लेना मुझे उचित जान पड़ता है॥ ६६-६७ ॥
‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनाथ! इस प्रकार इस राक्षसकी सरलता और निर्दोषताके विषयमें मैंने यथाशक्ति निवेदन किया। इसे सुनकर आगे आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
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