भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1730

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अठारहवाँ सर्ग

भगवान् श्रीरामका शरणागतकी रक्षाका महत्त्व एवं अपना व्रत बताकर विभीषणसे मिलना

वायुनन्दन हनुमान्‌जीके मुखसे अपने मनमें बैठी हुई बात सुनकर दुर्जय वीर भगवान् श्रीरामका चित्त प्रसन्न हो गया। वे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘मित्रो! विभीषणके सम्बन्धमें मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ। आप सब लोग मेरे हितसाधनमें संलग्न रहनेवाले हैं। अतः मेरी इच्छा है कि आप भी उसे सुन लें॥ २ ॥

‘जो मित्रभावसे मेरे पास आ गया हो, उसे मैं किसी तरह त्याग नहीं सकता। सम्भव है उसमें कुछ दोष भी हों, परंतु दोषीको आश्रय देना भी सत्पुरुषोंके लिये निन्दित नहीं है (अतः विभीषणको मैं अवश्य अपनाऊँगा)’ ॥ ३ ॥

वानरराज सुग्रीवने भगवान् श्रीरामके इस कथनको सुनकर स्वयं भी उसे दोहराया और उसपर विचार करके यह परम सुन्दर बात कही— ॥ ४ ॥

‘प्रभो! यह दुष्ट हो या अदुष्ट, इससे क्या? है तो यह निशाचर ही। फिर जो पुरुष ऐसे संकटमें पड़े हुए अपने भाईको छोड़ सकता है, उसका दूसरा ऐसा कौन सम्बन्धी होगा, जिसे वह त्याग न सके’॥ ५१/२ ॥

वानरराज सुग्रीवकी यह बात सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरघुनाथजी सबकी ओर देखकर कुछ मुसकराये और पवित्र लक्षणवाले लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले— ॥

‘सुमित्रानन्दन! इस समय वानरराजने जैसी बात कही है, वैसी कोई भी पुरुष शास्त्रोंका अध्ययन और गुरुजनोंकी सेवा किये बिना नहीं कह सकता॥ ८ ॥

‘परंतु सुग्रीव! तुमने विभीषणमें जो भाईके परित्यागरूप दोषकी उद्भावना की है, उस विषयमें मुझे एक ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म अर्थकी प्रतीति हो रही है, जो समस्त राजाओंमें प्रत्यक्ष देखा गया है और सभी लोगोंमें प्रसिद्ध है (मैं उसीको तुम सब लोगोंसे कहना चाहता हूँ॥ ९ ॥

‘राजाओंके छिद्र दो प्रकारके बताये गये हैं—एक तो उसी कुलमें उत्पन्न हुए जाति-भाई और दूसरे पड़ोसी देशोंके निवासी। ये संकटमें पड़नेपर अपने विरोधी राजा या राजपुत्रपर प्रहार कर बैठते हैं। इसी भयसे यह विभीषण यहाँ आया है (इसे भी अपने जाति-भाइयोंसे भय है)॥ १० ॥