भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1731, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1731

‘जिनके मनमें पाप नहीं है, ऐसे एक कुलमें उत्पन्न हुए भाई-बन्धु अपने कुटुम्बीजनोंको हितैषी मानते हैं, परंतु यही सजातीय बन्धु अच्छा होनेपर भी प्रायः राजाओंके लिये शङ्कनीय होता है (रावण भी विभीषणको शङ्काकी दृष्टिसे देखने लगा है; इसलिये इसका अपनी रक्षाके लिये यहाँ आना अनुचित नहीं है। अतः तुम्हें इसके ऊपर भाईके त्यागका दोष नहीं लगाना चाहिये)॥ ११ ॥

‘तुमने शत्रुपक्षीय सैनिकको अपनानेमें जो यह दोष बताया है कि वह अवसर देखकर प्रहार कर बैठता है, उसके विषयमें मैं तुम्हें यह नीतिशास्त्रके अनुकूल उत्तर दे रहा हूँ, सुनो॥ १२ ॥

‘हमलोग इसके कुटुम्बी तो हैं नहीं (अतः हमसे स्वार्थ-हानिकी आशंका इसे नहीं है) और यह राक्षस राज्य पानेका अभिलाषी है (इसलिये भी यह हमारा त्याग नहीं कर सकता)। इन राक्षसोंमें बहुत-से लोग बड़े विद्वान् भी होते हैं (अतः वे मित्र होनेपर बड़े कामके सिद्ध होंगे) इसलिये विभीषणको अपने पक्षमें मिला लेना चाहिये॥ १३ ॥

‘हमसे मिल जानेपर ये विभीषण आदि निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जायँगे। इनकी जो यह शरणागतिके लिये प्रबल पुकार है, इससे मालूम होता है, राक्षसोंमें एक-दूसरेसे भय बना हुआ है। इसी कारणसे इनमें परस्पर फूट होगी और ये नष्ट हो जायँगे। इसलिये भी विभीषणको ग्रहण कर लेना चाहिये॥ १४ ॥

‘तात सुग्रीव! संसारमें सब भाई भरतके ही समान नहीं होते। बापके सब बेटे मेरे ही जैसे नहीं होते और सभी मित्र तुम्हारे ही समान नहीं हुआ करते हैं’॥ १५ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित महाबुद्धिमान् सुग्रीवने उठकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥

‘उचित कार्य करनेवालोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप उस राक्षसको रावणका भेजा हुआ ही समझें। मैं तो उसे कैद कर लेना ही ठीक समझता हूँ॥ १७ ॥

‘निष्पाप श्रीराम! यह निशाचर रावणके कहनेसे मनमें कुटिल विचार लेकर ही यहाँ आया है। जब हमलोग इसपर विश्वास करके इसकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँगे, उस समय यह आपपर, मुझपर अथवा लक्ष्मणपर भी प्रहार कर सकता है। इसलिये महाबाहो! क्रूर रावणके भाई इस विभीषणका मन्त्रियोंसहित वध कर देना ही उचित है’॥ १८-१९ ॥