भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1837

घोड़ोंकी टापसे चूर्ण होकर रथके पहियोंसे उड़ायी हुई धरतीकी धूल योद्धाओंके कान और नेत्र बंद कर देती थी॥ १० १/२ ॥

इस प्रकार रोमाञ्चकारी भयंकर संग्रामके छिड़ जानेपर वहाँ रक्तके प्रवाहको बहानेवाली खूनकी बड़ी भयंकर नदियाँ बहने लगीं॥ ११ ॥

तदनन्तर भेरी, मृदङ्ग और पणव आदि बाजोंकी ध्वनि होने लगी, जो शङ्खोंके शब्द तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिलकर बड़ी अद्भुत जान पड़ती थी॥ १२ ॥

घायल होकर कराहते हुए राक्षसों और शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हुए वानरोंका आर्तनाद वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ १३ ॥

शक्ति, शूल और फरसोंसे मारे गये मुख्य-मुख्य वानरों तथा वानरोंद्वारा कालके गालमें डाले गये इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ पर्वताकार राक्षसोंसे उपलक्षित उस युद्धभूमिमें रक्तके प्रवाहसे कीच हो गयी थी। उसे पहचानना कठिन हो रहा था तथा वहाँ ठहरना तो और मुश्किल हो गया था। ऐसा जान पड़ता था उस भूमिको शस्त्ररूपी पुष्पोंका उपहार अर्पित किया गया है॥

वानरों और राक्षसोंका संहार करनेवाली वह भयंकर रजनी कालरात्रिके समान समस्त प्राणियोंके लिये दुर्लङ्घ्य हो गयी थी॥ १६ ॥

तदनन्तर उस दारुण अन्धकारमें वहाँ वे सब राक्षस हर्ष और उत्साहमें भरकर बाणोंकी वर्षा करते हुए श्रीरामपर ही धावा करने लगे॥ १७ ॥

उस समय कुपित हो गर्जना करते हुए उन आक्रमणकारी राक्षसोंका शब्द प्रलयके समय सातों समुद्रोंके महान् कोलाहल-सा जान पड़ता था॥ १८ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने पलक मारते-मारते अग्निज्वालाके समान छः भयानक बाणोंसे निम्नाङ्कित छः निशाचरोंको घायल कर दिया॥ १९ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—दुर्धर्ष वीर यज्ञशत्रु, महापार्श्व, महोदर, महाकाय, वज्रदंष्ट्र तथा वे दोनों शुक और सारण॥ २० ॥

श्रीरामके बाणसमूहोंसे सारे मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचनेके कारण वे छहों राक्षस युद्ध छोड़कर भाग गये; इसीलिये उनकी आयु शेष रह गयी—जान बच गयी॥ २१ ॥