भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1838

महारथी श्रीरामने अग्निशिखाके समान प्रज्वलित भयंकर बाणोंद्वारा पलक मारते-मारते सम्पूर्ण दिशाओं और उनके कोणोंको निर्मल (प्रकाशपूर्ण) कर दिया॥ २२ ॥

दूसरे भी जो-जो राक्षसवीर श्रीरामके सामने खड़े थे, वे भी उसी प्रकार नष्ट हो गये, जैसे आगमें पड़कर पतिंगे जल जाते हैं॥ २३ ॥

चारों ओर सुवर्णमय पङ्खवाले बाण गिर रहे थे। उनकी प्रभासे वह रजनी जुगुनुओंसे विचित्र दिखायी देनेवाली शरद् ऋतुकी रात्रिके समान अद्भुत प्रतीत होती थी॥ २४ ॥

राक्षसोंके सिंहनादों और भेरियोंकी आवाजोंसे वह भयानक रात्रि और भी भयंकर हो उठी थी॥ २५ ॥

सब ओर फैले हुए उस महान् शब्दसे प्रतिध्वनित हो कन्दराओंसे व्याप्त त्रिकूट पर्वत मानो किसीकी बातका उत्तर देता-सा जान पड़ता था॥ २६ ॥

लंगूर जातिके विशालकाय वानर जो अन्धकारके समान काले थे, निशाचरोंको दोनों भुजाओंमें कसकर मार डालते और उन्हें कुत्ते आदिको खिला देते थे॥

दूसरी ओर अङ्गद रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करनेके लिये आगे बढ़े। उन्होंने रावणपुत्र इन्द्रजित्को घायल कर दिया तथा उसके सारथि और घोड़ोंको भी यमलोक पहुँचा दिया॥ २८ ॥

अङ्गदके द्वारा घोड़े और सारथिके मारे जानेपर महान् कष्टमें पड़ा हुआ इन्द्रजित् रथको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गया॥ २९ ॥

प्रशंसाके योग्य वालिकुमार अङ्गदके उस पराक्रमकी ऋषियोंसहित देवताओं तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ ३० ॥

सम्पूर्ण प्राणी युद्धमें इन्द्रजित्के प्रभावको जानते थे; अतः अङ्गदके द्वारा उसको पराजित हुआ देख उन महात्मा अंगदपर दृष्टिपात करके सबको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३१ ॥

शत्रुको पराजित हुआ देख सुग्रीव और विभीषण-सहित सब वानर बड़े प्रसन्न हुए और अङ्गदको साधुवाद देने लगे॥ ३२ ॥

युद्धस्थलमें भयानक कर्म करनेवाले वालिपुत्र अङ्गदसे पराजित होकर इन्द्रजित्ने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया॥ ३३ ॥