श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1892, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय दोनों सेनाएँ जलके भँवरकी भाँति चक्कर काट रही थीं। विक्षुब्ध अपार महासागरकी गर्जनाके समान उनकी गर्जना सुनायी दे रही थी॥ २५ ॥
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए रणदुर्मद राक्षस प्रहस्तने अपने बाण-समूहोंद्वारा उस महासमरमें वानरोंको पीड़ित करना आरम्भ किया॥ २६ ॥
पृथ्वीपर वानरों और राक्षसोंकी लाशोंके ढेर लग गये। उनसे आच्छादित हुई रणभूमि भयानक पर्वतोंसे ढकी हुई-सी जान पड़ती थी॥ २७ ॥
रक्तके प्रवाहसे आच्छादित हुई वह युद्धभूमि वैशाख-मासमें खिले हुए पलाश-वृक्षोंसे ढकी हुई वन्य भूमि-सी सुशोभित होती थी॥ २८ ॥
मारे गये वीरोंकी लाशें ही जिसके दोनों तट थे। रक्तका प्रवाह ही जिसकी महान् जलराशि थी। टूटे-फूटे अस्त्र-शस्त्र ही जिसके तटवर्ती विशाल वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। जो यमलोकरूपी समुद्रसे मिली हुई थी। सैनिकोंके यकृत् और प्लीहा (हृदयके दाहिने और बायें भाग) जिसके महान् पंक थे। निकली हुई आँतें जहाँ सेवारका काम देती थीं। कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य-से प्रतीत होते थे। शरीरके छोटे-छोटे अवयव एवं केश जिसमें घासका भ्रम उत्पन्न करते थे। जहाँ गीध ही हंस बनकर बैठे थे। कङ्करूपी सारस जिसका सेवन करते थे। मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे। पीड़ितोंकी कराह जिसकी कलकल ध्वनि थी और कायरोंके लिये जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था, उस युद्धभूमिरूपिणी नदीको प्रवाहित करके राक्षस और श्रेष्ठ वानर वर्षाके अन्तमें हंसों और सारसोंसे सेवित सरिताकी भाँति उस दुस्तर नदीको उसी तरह पार कर रहे थे, जैसे गजयूथपति कमलोंके परागसे आच्छादित किसी पुष्करिणीको पार करते हैं॥ २९—३३ ॥
तदनन्तर नीलने देखा, रथपर बैठा हुआ प्रहस्त बाणसमूहोंकी वर्षा करके वेगपूर्वक वानरोंका संहार कर रहा है॥ ३४ ॥
तब जैसे उठी हुई प्रचण्ड वायु आकाशमें महान् मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार नील भी बलपूर्वक राक्षस-सेनाका संहार करने लगे। इससे उस युद्धस्थलमें राक्षसी-सेना भाग खड़ी हुई। सेनापति प्रहस्तने जब अपनी सेनाकी ऐसी दुरवस्था देखी, तब उसने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा नीलपर ही धावा किया॥ ३५ १/२ ॥
धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और निशाचरोंकी सेनाके नायक प्रहस्तने उस महासमरमें अपने धनुषको खींचकर नीलपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ३६ १/२ ॥