श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1893, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंरोषसे भरे हुए सर्पोंके समान वे महान् वेगशाली बाण नीलतक पहुँचकर उन्हें विदीर्ण करके बड़ी सावधानीके साथ धरतीमें समा गये॥ ३७ १/२ ॥
प्रहस्तके पैने बाण प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे। उनकी चोटसे नील बहुत घायल हो गये। इस तरह उस परम दुर्जय राक्षस प्रहस्तको अपने ऊपर आक्रमण करते देख बल-विक्रमशाली महाकपि नीलने एक वृक्ष उखाड़कर उसीके द्वारा उसपर आघात किया॥
नीलकी चोट खाकर कुपित हुआ राक्षसशिरोमणि प्रहस्त बड़े जोरसे गर्जता हुआ उन वानर-सेनापतिपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ४० ॥
उस दुरात्मा राक्षसके बाण-समूहोंका निवारण करनेमें समर्थ न हो सकनेपर नील आँख बंद करके उन सब बाणोंको अपने अंगोंपर ही ग्रहण करने लगे। जैसे साँड़ सहसा आयी हुई शरद्-ऋतुकी वर्षाको चुपचाप अपने शरीरपर ही सह लेता है, उसी प्रकार प्रहस्तकी उस दुःसह बाणवर्षाको नील चुपचाप नेत्र बंद करके सहन करते रहे॥ ४१-४२ ॥
प्रहस्तकी बाणवर्षासे कुपित हो महाबली महाकपि नीलने एक विशाल सालवृक्षके द्वारा उसके घोड़ोंको मार डाला॥ ४३ ॥
तत्पश्चात् रोषसे भरे हुए नीलने उस दुरात्माके धनुषको भी वेगपूर्वक तोड़ दिया और बारंबार वे गर्जना करने लगे॥ ४४ ॥
नीलके द्वारा धनुषरहित किया गया सेनापति प्रहस्त एक भयानक मूसल हाथमें लेकर अपने रथसे कूद पड़ा॥ ४५ ॥
वे दोनों वीर अपनी-अपनी सेनाके प्रधान थे। दोनों ही एक-दूसरेके वैरी और वेगशाली थे। वे मदकी धारा बहानेवाले दो गजराजोंके समान खूनसे नहा उठे थे॥ ४६ ॥
दोनों ही अपनी तीखी दाढ़ोंसे काट-काटकर एक-दूसरेके अंगोंको घायल किये देते थे। वे दोनों सिंह और बाघके समान शक्तिशाली और उन्हींके समान विजयके लिये सचेष्ट थे॥ ४७ ॥
दोनों वीर पराक्रमी, विजयी और युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले थे तथा वृत्रासुर और इन्द्रके समान युद्धमें यश पानेकी अभिलाषा रखते थे॥ ४८ ॥
उस समय परम उद्योगी प्रहस्तने नीलके ललाटमें मूसलसे आघात किया। इससे उनके ललाटसे रक्तकी धारा बह चली॥ ४९ ॥