श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1900, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनकी बात सुनकर महातेजस्वी सत्यपराक्रमी श्रीरामने कहा— 'अच्छा लक्ष्मण! जाओ। किंतु संग्राममें विजय पानेके लिये पूर्ण प्रयत्नशील रहना'॥ ४८॥
'क्योंकि रावण महान् बल-विक्रमसे सम्पन्न है। यह युद्धमें अद्भुत पराक्रम दिखाता है। रावण यदि अधिक कुपित होकर युद्ध करने लगे तो तीनों लोकोंके लिये इसके वेगको सहन करना कठिन हो जायगा'॥ ४९॥
'तुम युद्धमें रावणके छिद्र देखना। उसकी कमजोरियोंसे लाभ उठाना और अपने छिद्रोंपर भी दृष्टि रखना (कहीं शत्रु उनसे लाभ न उठाने पाये)। एकाग्रचित्त हो पूरी सावधानीके साथ अपनी दृष्टि और धनुषसे भी आत्मरक्षा करना'॥ ५०॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण उनके हृदयसे लग गये और श्रीरामका पूजन एवं अभिवादन करके वे युद्धके लिये चल दिये॥ ५१॥
उन्होंने देखा, रावणकी भुजाएँ हाथीके शुण्ड-दण्डके समान हैं। उसने बड़ा भयंकर एवं दीप्तिमान् धनुष उठा रखा है और बाण-समूहोंकी वर्षा करके वानरोंको ढकता तथा उनके शरीरोंको छिन्न-भिन्न किये डालता है॥ ५२॥
रावणको इस प्रकार पराक्रम करते देख महातेजस्वी पवनपुत्र हनुमान्जी उसके बाण-समूहोंका निवारण करते हुए उसकी ओर दौड़े॥ ५३॥
उसके रथके पास पहुँचकर अपना दायाँ हाथ उठा बुद्धिमान् हनुमान्ने रावणको भयभीत करते हुए कहा—॥
'निशाचर! तुमने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसोंसे न मारे जानेका वर प्राप्त कर लिया है; परंतु वानरोंसे तो तुम्हें भय है ही॥ ५५॥
'देखो, पाँच अँगुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ उठा हुआ है। तुम्हारे शरीरमें चिरकालसे जो जीवात्मा निवास करता है, उसे आज यह इस देहसे अलग कर देगा'॥ ५६॥
हनुमान्जीका यह वचन सुनकर भयानक पराक्रमी रावणके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे और उसने रोषपूर्वक कहा—॥ ५७॥
'वानर! तुम निःशङ्क होकर शीघ्र मेरे ऊपर प्रहार करो और सुस्थिर यश प्राप्त कर लो। तुममें कितना पराक्रम है, यह जान लेनेपर ही मैं तुम्हारा नाश करूँगा'॥