श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1901, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंरावणकी बात सुनकर पवनपुत्र हनुमान्जी बोले—‘मैंने तो पहले ही तुम्हारे पुत्र अक्षको मार डाला है। इस बातको याद तो करो’॥ ५९ ॥
उनके इतना कहते ही बल-विक्रमसम्पन्न महातेजस्वी राक्षसराज रावणने उन पवनकुमारकी छातीमें एक तमाचा जड़ दिया॥ ६० ॥
उस थप्पड़की चोटसे हनुमान्जी बारंबार इधर-उधर चक्कर काटने लगे; परंतु वे बड़े बुद्धिमान् और तेजस्वी थे, अतः दो ही घड़ीमें अपनेको सुस्थिर करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने भी अत्यन्त कुपित होकर उस देवद्रोहीको थप्पड़से ही मारा॥ ६१ १/२ ॥
उन महात्मा वानरके थप्पड़की मार खाकर दशमुख रावण उसी तरह काँप उठा, जैसे भूकम्प आनेपर पर्वत हिलने लगता है॥ ६२ १/२ ॥
संग्रामभूमिमें रावणको थप्पड़ खाते देख ऋषि, वानर, सिद्ध, देवता और असुर सभी हर्षध्वनि करने लगे॥ ६३ १/२ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी रावणने सँभलकर कहा— ‘शाबाश वानर! शाबाश, तुम पराक्रमकी दृष्टिसे मेरे प्रशंसनीय प्रतिद्वन्द्वी हो’॥ ६४ १/२ ॥
रावणके ऐसा कहनेपर पवनकुमार हनुमान्ने कहा—‘रावण! तू अब भी जीवित है, इसलिये मेरे पराक्रमको धिक्कार है!॥ ६५ १/२ ॥
‘दुर्बुद्धे! अब तुम एक बार और मुझपर प्रहार करो। बढ़-बढ़कर बातें क्यों बना रहे हो। तुम्हारे प्रहारके पश्चात् जब मेरा मुक्का पड़ेगा, तब वह तुम्हें तत्काल यमलोक पहुँचा देगा’॥ ६६ १/२ ॥
हनुमान्जीकी इस बातसे रावणका क्रोध प्रज्वलित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। उस पराक्रमी राक्षसने बड़े यत्नसे दाहिना मुक्का तानकर हनुमान्जीकी छातीमें वेगपूर्वक प्रहार किया॥ ६७-६८ ॥
छातीमें चोट लगनेपर हनुमान्जी पुनः विचलित हो उठे। महाबली हनुमान्जीको उस समय विह्वल देख अतिरथी रावण रथके द्वारा शीघ्र ही नीलपर जा चढ़ा॥
राक्षसोंके राजा प्रतापी दशग्रीवने शत्रुओंके मर्मको विदीर्ण करनेवाले सर्पतुल्य भयंकर बाणोंद्वारा वानर-सेनापति नीलको संताप देना आरम्भ किया॥ ७०-७१ ॥