श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1902, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसके बाण-समूहोंसे पीड़ित हुए वानर-सेनापति नीलने उस राक्षसराजपर एक ही हाथसे पर्वतका एक शिखर उठाकर चलाया॥ ७२ ॥
इतनेहीमें तेजस्वी महामना हनुमान्जी भी संभल गये और पुनः युद्धकी इच्छासे रावणकी ओर देखने लगे। उस समय राक्षसराज रावण नीलके साथ उलझा हुआ था। हनुमान्जीने उससे रोषपूर्वक कहा—‘ओ निशाचर! इस समय तुम दूसरेके साथ युद्ध कर रहे हो, अतः अब तुमपर धावा करना मेरे लिये उचित न होगा’॥
उधर महातेजस्वी रावणने नीलके चलाये हुए पर्वत-शिखरपर तीखे अग्रभागवाले सात बाण मारे, जिससे वह टूट-फूटकर पृथ्वीपर बिखर गया॥ ७५ ॥
उस पर्वतशिखरको बिखरा हुआ देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वानर-सेनापति नील प्रलयकालकी अग्निके समान क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे॥ ७६ ॥
उन्होंने युद्धस्थलमें अश्वकर्ण, साल, खिले हुए आम्र तथा अन्य नाना प्रकारके वृक्षोंको उखाड़-उखाड़कर रावणपर चलाना आरम्भ किया॥ ७७ ॥
रावणने उन सब वृक्षोंको सामने आनेपर काट गिराया और अग्निपुत्र नीलपर बाणोंकी भयानक वर्षा की॥
जैसे मेघ किसी महान् पर्वतपर जलकी वर्षा करता है, उसी तरह रावणने जब नीलपर बाणसमूहोंकी वर्षा की, तब वे छोटा-सा रूप बनाकर रावणकी ध्वजाके शिखरपर चढ़ गये॥ ७९ ॥
अपनी ध्वजाके ऊपर बैठे हुए अग्निपुत्र नीलको देखकर रावण क्रोधसे जल उठा और उधर नील जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ८० ॥
नीलको कभी रावणकी ध्वजापर, कभी धनुषपर और कभी मुकुटपर बैठा देख श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमान्जीको भी बड़ा विस्मय हुआ॥ ८१ ॥
वानर नीलकी वह फुर्ती देखकर महातेजस्वी रावणको भी बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने अद्भुत तेजस्वी आग्नेयास्त्र हाथमें लिया॥ ८२ ॥
नीलकी फुर्तीसे रावणको घबराया हुआ देख हर्षका अवसर पाकर सब वानर बड़ी प्रसन्नताके साथ किलकारियाँ भरने लगे॥ ८३ ॥