श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1903, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय वानरोंके हर्षनादसे रावणको बड़ा क्रोध हुआ। साथ ही हृदयमें घबराहट छा गयी थी, इसलिये वह कर्तव्यका कुछ निश्चय नहीं कर सका॥
तदनन्तर निशाचर रावणने आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रित बाण हाथमें लेकर ध्वजके अग्रभागपर बैठे हुए नीलको देखा॥ ८५ ॥
देखकर महातेजस्वी राक्षसराज रावणने उनसे कहा— 'वानर! तुम उच्चकोटिकी मायाके साथ ही अपने भीतर बड़ी फुर्ती भी रखते हो॥ ८६ ॥
‘वानर! यदि शक्तिशाली हो तो मेरे बाणसे अपने जीवनकी रक्षा करो। यद्यपि तुम अपने पराक्रमके योग्य ही भिन्न-भिन्न प्रकारके कर्म कर रहे हो तथापि मेरा छोड़ा हुआ दिव्यास्त्र-प्रेरित बाण जीवन-रक्षाकी चेष्टा करनेपर भी तुम्हें प्राणहीन कर देगा’॥ ८७-८८ ॥
ऐसा कहकर महाबाहु राक्षसराज रावणने आग्नेयास्त्रयुक्त रु बाणका संधान करके उसके द्वारा सेनापति नीलको मारा॥ ८९ ॥
उसके धनुषसे छूटे हुए उस बाणने नीलकी छातीपर गहरी चोट की। वे उसकी आँचसे जलते हुए सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ९० ॥
यद्यपि नीलने पृथ्वीपर घुटने टेक दिये, तथापि पिता अग्निदेवके माहात्म्यसे और अपने तेजके प्रभावसे उनके प्राण नहीं निकले॥ ९१ ॥
वानर नीलको अचेत हुआ देख रणोत्सुक रावणने मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले रथके द्वारा सुमित्राकुमार लक्ष्मणपर धावा किया॥ ९२ ॥
युद्धभूमिमें सारी वानरसेनाको आगे बढ़नेसे रोककर वह लक्ष्मणके पास पहुँच गया और प्रज्वलित अग्निके समान सामने खड़ा हो प्रतापी राक्षसराज रावण अपने धनुषकी टंकार करने लगा॥ ९३ ॥
उस समय अपने अनुपम धनुषको खींचते हुए रावणसे उदार शक्तिशाली लक्ष्मणने कहा— ‘निशाचरराज! समझ लो, मैं आ गया। अतः अब तुम्हें वानरोंके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये’॥ ९४ ॥
लक्ष्मणकी यह बात गम्भीर ध्वनिसे युक्त थी और उनकी प्रत्यञ्चासे भी भयानक टंकार-ध्वनि हो रही थी। उसे सुनकर युद्धके लिये उपस्थित हुए सुमित्राकुमारके निकट जा राक्षसोंके राजा रावणने रोषपूर्वक कहा— ॥