श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1904, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘रघुवंशी राजकुमार! सौभाग्यकी बात है कि तुम मेरी आँखोंके सामने आ गये। तुम्हारा शीघ्र ही अन्त होनेवाला है, इसीलिये तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गयी है। अब तुम मेरे बाणसमूहोंसे पीड़ित हो इसी क्षण यमलोककी यात्रा करोगे'॥ ९६ ॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मणको उसकी बात सुनकर कोर्इ विस्मय नहीं हुआ। उसके दाँत बड़े ही तीखे और उत्कट थे और वह जोर-जोरसे गर्जना कर रहा था। उस समय सुमित्राकुमारने उससे कहा—‘राजन्! महान् प्रभावशाली पुरुष तुम्हारी तरह केवल गर्जना नहीं करते हैं (कुछ पराक्रम करके दिखाते हैं)। पापाचारियोंमें अग्रगण्य रावण! तुम तो झूठे ही डींग हाँकते हो॥ ९७ ॥
‘राक्षसराज! (तुमने सूने घरसे जो चोरी-चोरी एक असहाय नारीका अपहरण किया, इसीसे) मैं तुम्हारे बल, वीर्य, प्रताप और पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ; इसीलिये हाथमें धनुष-बाण लेकर सामने खड़ा हूँ। आओ युद्ध करो। व्यर्थ बातें बनानेसे क्या होगा?’॥ ९८ ॥
उनके ऐसा कहनेपर कुपित हुए राक्षसराजने उनपर सुन्दर पंखवाले सात बाण छोड़े; परंतु लक्ष्मणने सोनेके बने हुए विचित्र पंखोंसे सुशोभित और तेज धारवाले बाणोंसे उन सबको काट डाला॥ ९९ ॥
जैसे बड़े-बड़े सर्पोंके शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायँ, उसी प्रकार अपने समस्त बाणोंको सहसा खण्डित हुआ देख लङ्कापति रावण क्रोधके वशीभूत हो गया और उसने दूसरे तीखे बाण छोड़े॥ १०० ॥
परंतु श्रीरामके छोटे भार्इ लक्ष्मण इससे विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने धनुषसे बाणोंकी भयंकर वर्षा की और क्षुर, अर्धचन्द्र, उत्तम कर्णी तथा भल्ल जातिके बाणोंद्वारा रावणके छोड़े हुए उन सब बाणोंको काट डाला॥ १०१ ॥
उन सभी बाणसमूहोंको निष्फल हुआ देख राक्षसराज रावण लक्ष्मणकी फुर्तीसे आश्चर्यचकित रह गया और उनपर पुनः तीखे बाण छोड़ने लगा॥ १०२ ॥
देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी लक्ष्मणने भी रावणके वधके लिये वज्रके समान भयानक वेग और तीखी धारवाले पैने बाणोंको, जो अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे, धनुषपर रखा॥ १०३ ॥
परंतु राक्षसराजने उन सभी तीखे बाणोंको काट डाला और ब्रह्माजीके दिये हुए कालाग्निके समान तेजस्वी बाणसे लक्ष्मणजीके ललाटपर चोट की॥ १०४ ॥