श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1905, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंरावणके उस बाणसे पीड़ित हो लक्ष्मणजी विचलित हो उठे। उन्होंने हाथमें जो धनुष ले रखा था, उसकी मुट्ठी ढीली पड़ गयी। फिर उन्होंने बड़े कष्टसे होश सँभाला और देवद्रोही रावणके धनुषको काट दिया॥ १०५ ॥
धनुष कट जानेपर रावणको लक्ष्मणने तीन बाण मारे, जो बहुत ही तीखे थे। उन बाणोंसे पीड़ित हो राजा रावण व्याकुल हो गया और बड़ी कठिनाईसे वह फिर सचेत हो सका॥ १०६ ॥
जब धनुष कट गया और बाणोंकी गहरी चोट खानी पड़ी, तब रावणका सारा शरीर मेदे और रक्तसे भीग गया। उस अवस्थामें उस भयंकर शक्तिशाली देवद्रोही राक्षसने युद्धस्थलमें ब्रह्माजीकी दी हुई शक्ति उठा ली॥ १०७ ॥
वह शक्ति धूमयुक्त अग्निके समान दिखायी देती थी और युद्धमें वानरोंको भयभीत करनेवाली थी। राक्षसराजके स्वामी रावणने वह जलती हुई शक्ति बड़े वेगसे सुमित्राकुमारपर चलायी॥ १०८ ॥
अपनी ओर आती हुई उस शक्तिपर लक्ष्मणने अग्नितुल्य तेजस्वी बहुत-से बाणों तथा अस्त्रोंका प्रहार किया; तथापि वह शक्ति दशरथकुमार लक्ष्मणके विशाल वक्षःस्थलमें घुस गयी॥ १०९ ॥
रघुकुलके प्रधान वीर लक्ष्मण यद्यपि बड़े शक्तिशाली थे, तथापि उस शक्तिसे आहत हो पृथ्वीपर गिर पड़े और जलने-से लगे। उन्हें विह्वल हुआ देख राजा रावण सहसा उनके पास जा पहुँचा और उनको वेगपूर्वक अपनी दोनों भुजाओंसे उठाने लगा॥ ११० ॥
जिस रावणमें देवताओंसहित हिमालय, मन्दराचल, मेरुगिरि अथवा तीनों लोकोंको भुजाओंद्वारा उठा लेनेकी शक्ति थी, वही भरतके छोटे भाई लक्ष्मणको उठानेमें समर्थ न हो सका॥ १११ ॥
ब्रह्माकी शक्तिसे छातीमें चोट खानेपर भी लक्ष्मणजीने भगवान् विष्णुके अचिन्त्य अंशरूपसे अपना चिन्तन किया॥ ११२ ॥
अतः देवशत्रु रावण दानवोंका दर्प चूर्ण करनेवाले लक्ष्मणको अपनी दोनों भुजाओंमें दबाकर हिलानेमें भी समर्थ न हो सका॥ ११३ ॥
इसी समय क्रोधसे भरे हुए वायुपुत्र हनुमान्जी रावणकी ओर दौड़े और अपने वज्र-सरीखे मुक्केसे रावणकी छातीमें मारा॥ ११४ ॥