भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1906

उस मुक्केकी मारसे राक्षसराज रावणने धरतीपर घुटने टेक दिये। वह काँपने लगा और अन्ततोगत्वा गिर पड़ा॥ ११५ ॥

उसके मुख, नेत्र और कानोंसे बहुत-सा रक्त गिरने लगा और वह चक्कर काटता हुआ रथके पिछले भागमें निश्चेष्ट होकर जा बैठा॥ ११६ ॥

वह मूर्च्छित होकर अपनी सुध-बुध खो बैठा। वहाँ भी वह स्थिर न रह सका—तड़पता और छटपटाता रहा। समराङ्गणमें भयंकर पराक्रमी रावणको अचेत हुआ देख ऋषि, देवता, असुर और वानर हर्षनाद करने लगे॥

इसके पश्चात् तेजस्वी हनुमान् रावणपीड़ित लक्ष्मणको दोनों हाथोंसे उठाकर श्रीरघुनाथजीके निकट ले आये॥ ११८ १/२ ॥

हनुमान्जीके सौहार्द और उत्कट भक्तिभावके कारण लक्ष्मणजी उनके लिये हलके हो गये। शत्रुओंके लिये तो वे अब भी अकम्पनीय थे—वे उन्हें हिला नहीं सकते थे॥ ११९ ॥

युद्धमें पराजित हुए लक्ष्मणको छोड़कर वह शक्ति पुनः रावणके रथपर लौट आयी॥ १२० ॥

थोड़ी देरमें होशमें आनेपर महातेजस्वी रावणने फिर विशाल धनुष उठाया और पैने बाण हाथमें लिये॥

शत्रुसूदन लक्ष्मणजी भी भगवान् विष्णुके अचिन्तनीय अंशरूपसे अपना चिन्तन करके स्वस्थ और नीरोग हो गये॥ १२२ ॥

वानरोंकी विशाल वाहिनीके बड़े-बड़े वीर मार गिराये गये, यह देखकर रणभूमिमें रघुनाथजीने रावणपर धावा किया॥ १२३ ॥

उस समय हनुमान्जीने उनके पास आकर कहा— ‘प्रभो! जैसे भगवान् विष्णु गरुड़पर चढ़कर दैत्योंका संहार करते हैं, उसी प्रकार आप मेरी पीठपर चढ़कर इस राक्षसको दण्ड दें'॥ १२४ १/२ ॥

पवनकुमारकी कही हुई यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजी सहसा उन महाकपि हनुमान्की पीठपर चढ़ गये॥ १२५ १/२ ॥

महाराज श्रीरामने समराङ्गणमें रावणको रथपर बैठा देखा। उसे देखते ही महातेजस्वी श्रीराम रावणकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे कुपित हुए भगवान् विष्णु अपना चक्र उठाये