भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1907

विरोचनकुमार बलिपर टूट पड़े थे॥

उन्होंने अपने धनुषकी तीव्र टंकार प्रकट की, जो वज्रकी गड़गड़ाहटसे भी अधिक कठोर थी। इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी राक्षसराज रावणसे गम्भीर वाणीमें बोले— ‘राक्षसोंमें बाघ बने हुए रावण! खड़ा रह, खड़ा रह। मेरा ऐसा अपराध करके तू कहाँ जाकर प्राणसंकटसे छुटकारा पा सकेगा॥ १२९ ॥

‘यदि तू इन्द्र, यम अथवा सूर्यके पास, ब्रह्मा, अग्नि या शंकरके समीप अथवा दसों दिशाओंमें भागकर जायगा तो भी अब मेरे हाथसे बच नहीं सकेगा॥ १३० ॥

‘तूने आज अपनी शक्तिके द्वारा युद्धमें जाते हुए जिन लक्ष्मणको आहत किया और जो उस शक्तिकी चोटसे सहसा मूर्च्छित हो गये थे, उन्हींके उस तिरस्कारका बदला लेनेके लिये आज मैं युद्धभूमिमें उपस्थित हुआ हूँ। राक्षसराज! मैं पुत्र-पौत्रोंसहित तेरी मौत बनकर आया हूँ॥ १३१ ॥

‘रावण! तेरे सामने खड़े हुए इस रघुवंशी राजकुमारने ही अपने बाणोंद्वारा जनस्थाननिवासी उन चौदह हजार राक्षसोंका संहार कर डाला था, जो अद्भुत एवं दर्शनीय योद्धा थे और उत्तमोत्तम अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे’॥ १३२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर महाबली राक्षसराज रावण महान् रोषसे भर गया। उसे पहलेके वैरका स्मरण हो आया और उसने कालाग्निकी शिखाके समान दीप्तिशाली बाणोंद्वारा रणभूमिमें श्रीरघुनाथजीका वाहन बने हुए महान् वेगशाली वायुपुत्र हनुमान्को अत्यन्त घायल कर दिया॥ १३३-१३४ ॥

युद्धस्थलमें उस राक्षसके सायकोंसे आहत होनेपर भी स्वाभाविक तेजसे सम्पन्न हनुमान्जीका शौर्य और भी बढ़ गया॥ १३५ ॥

वानरशिरोमणि हनुमान्को रावणने घायल कर दिया, यह देखकर महातेजस्वी श्रीराम क्रोधके वशीभूत हो गये॥ १३६ ॥

फिर तो उन भगवान् श्रीरामने आक्रमण करके पहिये, घोड़े, ध्वजा, छत्र, पताका, सारथि, अशनि, शूल और खड्गसहित उसके रथको अपने पैने बाणोंसे तिल-तिल करके काट डाला॥ १३७ ॥

जैसे भगवान् इन्द्रने वज्रके द्वारा मेरु पर्वतपर आघात किया हो, उसी प्रकार प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने वज्र और अशनिके समान तेजस्वी बाणसे इन्द्रशत्रु रावणकी विशाल एवं सुन्दर