श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1908, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंछातीमें वेगपूर्वक आघात किया॥
जो राजा रावण वज्र और अशनिके आघातसे भी कभी क्षुब्ध एवं विचलित नहीं हुआ था, वही वीर उस समय श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे घायल हो अत्यन्त आर्त एवं कम्पित हो उठा और उसके हाथसे धनुष छूटकर गिर पड़ा॥ १३९ ॥
रावणको व्याकुल हुआ देख महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने एक चमचमाता हुआ अर्धचन्द्राकार बाण हाथमें लिया और उसके द्वारा राक्षसराजका सूर्यके समान देदीप्यमान मुकुट सहसा काट डाला॥ १४० ॥
उस समय धनुष न होनेसे रावण विषहीन सर्पके समान अपना प्रभाव खो बैठा था। सायंकालमें जिसकी प्रभा शान्त हो गयी हो, उस सूर्यदेवके समान निस्तेज हो गया था तथा मुकुटोंका समूह कट जानेसे श्रीहीन दिखायी देता था। उस अवस्थामें श्रीरामने युद्धभूमिमें राक्षसराजसे कहा— ॥ १४१ ॥
‘रावण! तुमने आज बड़ा भयंकर कर्म किया है, मेरी सेनाके प्रधान-प्रधान वीरोंको मार डाला है। इतनेपर भी थका हुआ समझकर मैं बाणोंद्वारा तुझे मौतके अधीन नहीं कर रहा हूँ॥ १४२ ॥
‘निशाचरराज! मैं जानता हूँ तू युद्धसे पीड़ित है। इसलिये आज्ञा देता हूँ, जा, लङ्कामें प्रवेश करके कुछ देर विश्राम कर ले। फिर रथ और धनुषके साथ निकलना। उस समय रथारूढ़ रहकर तू फिर मेरा बल देखना’॥
भगवान् श्रीरामके ऐसा कहनेपर राजा रावण सहसा लङ्कामें घुस गया। उसका हर्ष और अभिमान मिट्टीमें मिल चुका था, धनुष काट दिया गया था, घोड़े तथा सारथि मार डाले गये थे, महान् किरीट खण्डित हो चुका था और वह स्वयं भी बाणोंसे बहुत पीड़ित था॥ १४४ ॥
देवताओं और दानवोंके शत्रु महाबली निशाचरराज रावणके लङ्कामें चले जानेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने उस महायुद्धके मुहानेपर वानरोंके शरीरसे बाण निकाले॥
देवराज इन्द्रका शत्रु रावण जब युद्धस्थलसे भाग गया, तब उसके पराभवका विचार करके देवता, असुर, भूत, दिशाएँ, समुद्र, ऋषिगण, बड़े-बड़े नाग तथा भूचर और जलचर प्राणी भी बहुत प्रसन्न हुए॥ १४६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९ ॥