श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1950, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे पर्वत अपने ऊपर उगे हुए वृक्षोंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार सहस्रों वानरोंसे व्याप्त हुआ वह पर्वताकार राक्षस वीर अद्भुत शोभा पाने लगा॥ ३३॥
जैसे गरुड़ सर्पोंको अपना आहार बनाते हैं, उसी तरह अत्यन्त कुपित हुआ वह महाबली राक्षस समस्त वानरोंको दोनों हाथोंसे पकड़-पकड़कर भक्षण करने लगा॥ ३४॥
कुम्भकर्ण अपने पातालके समान मुखमें वानरोंको झोंकता जाता था और वे उसके कानों तथा नाकोंकी राहसे बाहर निकलते जाते थे॥ ३५॥
अत्यन्त क्रोधसे भरकर वानरोंका भक्षण करते हुए पर्वतके समान विशालकाय उस राक्षसराजने समस्त वानरोंके अङ्ग-भङ्ग कर डाले॥ ३६॥
रणभूमिमें रक्त और मांसकी कीच मचाता हुआ वह राक्षस बढ़ी हुई प्रलयाग्निके समान वानरसेनामें विचरने लगा॥ ३७॥
शूल हाथमें लेकर संग्रामभूमिमें विचरता हुआ महाबली कुम्भकर्ण वज्रधारी इन्द्र और पाशधारी यमराजके समान जान पड़ता था॥ ३८॥
जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें दावानल सूखे जंगलोंको जला देता है, उसी प्रकार कुम्भकर्ण वानरसेनाओंको दग्ध करने लगा॥ ३९॥
जिनके यूथ-के-यूथ नष्ट हो गये थे, वे वानर कुम्भकर्णकी मार खाकर भयसे उद्विग्न हो उठे और विकृत स्वरमें चीत्कार करने लगे॥ ४०॥
कुम्भकर्णके हाथसे मारे जाते हुए बहुत-से वानर, जिनका दिल टूट गया था, व्यथित हो श्रीरघुनाथजीकी शरणमें गये॥ ४१॥
वानरोंको भागते देख वालिकुमार अङ्गद उस महासमरमें कुम्भकर्णकी ओर बड़े वेगसे दौड़े॥ ४२॥
उन्होंने बारंबार गर्जना करके एक विशाल शैल-शिखर हाथमें ले लिया और कुम्भकर्णके पीछे चलनेवाले समस्त राक्षसोंको भयभीत करते हुए उस पर्वतशिखरको उसके मस्तकपर दे मारा॥ ४३ १/२॥
मस्तकपर उस पर्वत-शिखरकी चोट खाकर इन्द्रद्रोही कुम्भकर्ण उस समय महान् क्रोधसे जल उठा और उस प्रहारको सहन न कर सकनेके कारण बड़े वेगसे वालिपुत्रकी ओर दौड़ा॥ ४४-४५॥