श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1951, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंबड़े जोरसे गर्जना करनेवाले महाबली कुम्भकर्णने समस्त वानरोंको संत्रस्त करते हुए अङ्गदपर बड़े रोषसे शूलका प्रहार किया॥ ४६ ॥
किंतु युद्धमार्गके ज्ञाता बलवान् वानरशिरोमणि अङ्गदने फुर्तीसे हटकर अपनी ओर आते हुए उस शूलसे अपने-आपको बचा लिया॥ ४७ ॥
साथ ही बड़े वेगसे उछलकर उन्होंने उसकी छातीमें एक थप्पड़ मारा। क्रोधपूर्वक चलाये हुए उस थप्पड़की मार खाकर वह पर्वताकार राक्षस मूर्च्छित हो गया॥ ४८ ॥
थोड़ी देरमें जब उसे होश हुआ, तब उस अत्यन्त बलशाली राक्षसने भी बायें हाथसे मुक्का बाँधकर अङ्गदपर प्रहार किया, जिससे वे अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ४९ ॥
वानरप्रवर अङ्गदके अचेत एवं धराशायी हो जानेपर कुम्भकर्ण वही शूल लेकर सुग्रीवकी ओर दौड़ा॥ ५० ॥
महाबली कुम्भकर्णको अपनी ओर आते देख वीर वानरराज सुग्रीव तत्काल ऊपरकी ओर उछले॥
महाकपि सुग्रीवने एक पर्वत-शिखरको उठा लिया और उसे घुमाकर महाबली कुम्भकर्णपर वेगपूर्वक धावा किया॥ ५२ ॥
वानर सुग्रीवको आक्रमण करते देख कुम्भकर्ण अपने सारे अङ्गोंको फैलाकर उन वानरराजके सामने खड़ा हो गया॥ ५३ ॥
कुम्भकर्णका सारा शरीर वानरोंके रक्तसे नहा उठा था। वह बड़े-बड़े वानरोंको खाता हुआ उनके सामने खड़ा था। उसे देखकर सुग्रीवने कहा—॥ ५४ ॥
‘राक्षस! तुमने बहुत-से वीरोंको मार गिराया, अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया और कितने ही सैनिकोंको अपना आहार बना लिया। इससे तुम्हें शौर्यका महान् यश प्राप्त हुआ है। अब इन वानरोंकी सेनाको छोड़ दो। इन साधारण बंदरोंसे लड़कर क्या करोगे? यदि शक्ति हो तो मेरे चलाये हुए इस पर्वतकी एक ही चोट सह लो’॥ ५५-५६ ॥
वानरराजकी यह सत्त्व और धैर्यसे युक्त बात सुनकर राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण बोला—॥ ५७ ॥
‘वानर! तुम प्रजापतिके पौत्र, ऋक्षरजाके पुत्र तथा धैर्य एवं पौरुषसे सम्पन्न हो। इसीलिये इस तरह गरज रहे हो’॥ ५८ ॥