भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1952

कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर सुग्रीवने उस शैल-शिखरको घुमाकर सहसा उसके ऊपर छोड़ दिया। वह वज्र और अशनिके समान था। उसके द्वारा उन्होंने कुम्भकर्णकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी॥ ५९ ॥

किंतु उसके विशाल वक्षःस्थलसे टकराकर वह शैल-शिखर सहसा चूर-चूर हो गया। यह देख वानर तत्काल विषादमें डूब गये और राक्षस बड़े हर्षके साथ गर्जना करने लगे॥ ६० ॥

उस पर्वत-शिखरकी चोट खाकर कुम्भकर्णको बड़ा क्रोध हुआ। वह रोषसे मुँह फैलाकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। फिर उसने बिजलीके समान चमकनेवाले उस शूलको घुमाकर सुग्रीवके वधके लिये चलाया॥ ६१ ॥

कुम्भकर्णके हाथसे छूटे हुए उस तीखे शूलको, जिसके डंडेमें सोनेकी लड़ियाँ लगी हुई थीं, वायुपुत्र हनुमान्‌ने शीघ्र उछलकर दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और उसे वेगपूर्वक तोड़ डाला॥ ६२ ॥

वह महान् शूल हजार भार काले लोहेका बना हुआ था, जिसे हनुमान्‌जीने बड़े हर्षके साथ अपने घुटनोंमें लगाकर तत्काल तोड़ दिया॥ ६३ ॥

हनुमान्‌जीके द्वारा शूलको तोड़ा गया देख वानर-सेना बड़े हर्षसे भरकर बारंबार सिंहनाद करने लगी और चारों ओर दौड़ लगाने लगी॥ ६४ ॥

परंतु वह राक्षस भयसे थर्रा उठा। उसके मुखपर उदासी छा गयी और वनचारी वानर अत्यन्त प्रसन्न हो सिंहनाद करने लगे। उन सबने शूलको खण्डित हुआ देख पवनकुमार हनुमान्‌जीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥

इस प्रकार उस शूलको भग्न हुआ देख महाकाय राक्षसराज कुम्भकर्णको बड़ा क्रोध हुआ और उसने लङ्काके निकटवर्ती मलय पर्वतका शिखर उठाकर सुग्रीवके निकट जा उनपर दे मारा॥ ६६ ॥

उस शैल-शिखरसे आहत हो वानरराज सुग्रीव अपनी सुध-बुध खो बैठे और युद्धभूमिमें गिर पड़े। उन्हें अचेत होकर पृथ्वीपर पड़ा देख निशाचरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे रणक्षेत्रमें सिंहनाद करने लगे॥ ६७ ॥

तदनन्तर कुम्भकर्णने युद्धस्थलमें अद्भुत एवं भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले वानरराज सुग्रीवके पास जाकर उन्हें उठा लिया और जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी तरह वह उन्हें हर ले गया॥ ६८ ॥