श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1953, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुम्भकर्णका स्वरूप मेरुपर्वतके समान जान पड़ता था। वह महान् मेघके समान रूपवाले सुग्रीवको उठाकर जब युद्धस्थलसे चला, उस समय भयानक ऊँचे शिखरोंवाले मेरुगिरिके समान ही शोभा पाने लगा॥
उन्हें लेकर वह वीर राक्षसराज लङ्काकी ओर चल दिया। उस समय युद्धस्थलमें सभी राक्षस उसकी स्तुति कर रहे थे। वानरराजके पकड़े जानेसे आश्चर्यचकित हुए देवताओंका दुःखजनित शब्द उसे स्पष्ट सुनायी दे रहा था॥ ७० ॥
इन्द्रके समान पराक्रमी इन्द्रद्रोही कुम्भकर्णने उस समय देवेन्द्रतुल्य तेजस्वी वानरराज सुग्रीवको पकड़कर मन-ही-मन यह मान लिया कि इनके मारे जानेसे श्रीरामसहित यह सारी वानर-सेना स्वतः नष्ट हो जायगी॥
‘वानरोंकी सेना इधर-उधर भाग रही है और वानरराज सुग्रीवको कुम्भकर्णने पकड़ लिया है’, यह देखकर बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्ने सोचा— ‘सुग्रीवके इस प्रकार पकड़ लिये जानेपर मुझे क्या करना चाहिये?॥
‘मेरे लिये जो भी करना उचित होगा, उसे मैं निःसन्देह करूँगा। पर्वताकार रूप धारण करके उस राक्षसका नाश कर डालूँगा॥ ७४ ॥
‘युद्धस्थलमें अपने मुक्कोंसे मार-मारकर महाबली कुम्भकर्णके शरीरको चूर-चूर कर दूँगा; इस प्रकार जब वह मेरे हाथसे मारा जायगा तथा वानरराज सुग्रीवको उसकी कैदसे छुड़ा लिया जायगा, तब सारे वानर हर्षसे खिल उठेंगे; अच्छा ऐसा ही हो॥ ७५ ॥
‘अथवा ये सुग्रीव स्वयं ही उसकी पकड़से छूट जायँगे। यदि इन्हें देवता, असुर अथवा नाग भी पकड़ लें तो ये अपने ही प्रयत्नसे उनकी कैदसे भी छुटकारा पा जायँगे॥ ७६ ॥
‘मैं समझता हूँ कि युद्धमें कुम्भकर्णने शिलाके प्रहारसे सुग्रीवको जो गहरी चोट पहुँचायी है, उससे अचेत हुए वानरराजको अभीतक होश नहीं हुआ है॥
‘एक ही मुहूर्तमें जब सुग्रीव सचेत होंगे, तब महासमरमें अपने और वानरोंके लिये जो हितकर कर्म होगा, उसे करेंगे॥ ७८ ॥
‘यदि मैं इन्हें छुड़ाऊँ तो महात्मा सुग्रीवको प्रसन्नता नहीं होगी, उलटे इनके मनमें खेद होगा और सदाके लिये इनके यशका नाश हो जायगा॥ ७९ ॥