श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
कुम्भकर्णका स्वरूप मेरुपर्वतके समान जान पड़ता था। वह महान् मेघके समान रूपवाले सुग्रीवको उठाकर जब युद्धस्थलसे चला, उस समय भयानक ऊँचे शिखरोंवाले मेरुगिरिके समान ही शोभा पाने लगा॥
उन्हें लेकर वह वीर राक्षसराज लङ्काकी ओर चल दिया। उस समय युद्धस्थलमें सभी राक्षस उसकी स्तुति कर रहे थे। वानरराजके पकड़े जानेसे आश्चर्यचकित हुए देवताओंका दुःखजनित शब्द उसे स्पष्ट सुनायी दे रहा था॥ ७० ॥
इन्द्रके समान पराक्रमी इन्द्रद्रोही कुम्भकर्णने उस समय देवेन्द्रतुल्य तेजस्वी वानरराज सुग्रीवको पकड़कर मन-ही-मन यह मान लिया कि इनके मारे जानेसे श्रीरामसहित यह सारी वानर-सेना स्वतः नष्ट हो जायगी॥
‘वानरोंकी सेना इधर-उधर भाग रही है और वानरराज सुग्रीवको कुम्भकर्णने पकड़ लिया है’, यह देखकर बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्ने सोचा— ‘सुग्रीवके इस प्रकार पकड़ लिये जानेपर मुझे क्या करना चाहिये?॥
‘मेरे लिये जो भी करना उचित होगा, उसे मैं निःसन्देह करूँगा। पर्वताकार रूप धारण करके उस राक्षसका नाश कर डालूँगा॥ ७४ ॥
‘युद्धस्थलमें अपने मुक्कोंसे मार-मारकर महाबली कुम्भकर्णके शरीरको चूर-चूर कर दूँगा; इस प्रकार जब वह मेरे हाथसे मारा जायगा तथा वानरराज सुग्रीवको उसकी कैदसे छुड़ा लिया जायगा, तब सारे वानर हर्षसे खिल उठेंगे; अच्छा ऐसा ही हो॥ ७५ ॥
‘अथवा ये सुग्रीव स्वयं ही उसकी पकड़से छूट जायँगे। यदि इन्हें देवता, असुर अथवा नाग भी पकड़ लें तो ये अपने ही प्रयत्नसे उनकी कैदसे भी छुटकारा पा जायँगे॥ ७६ ॥
‘मैं समझता हूँ कि युद्धमें कुम्भकर्णने शिलाके प्रहारसे सुग्रीवको जो गहरी चोट पहुँचायी है, उससे अचेत हुए वानरराजको अभीतक होश नहीं हुआ है॥
‘एक ही मुहूर्तमें जब सुग्रीव सचेत होंगे, तब महासमरमें अपने और वानरोंके लिये जो हितकर कर्म होगा, उसे करेंगे॥ ७८ ॥
‘यदि मैं इन्हें छुड़ाऊँ तो महात्मा सुग्रीवको प्रसन्नता नहीं होगी, उलटे इनके मनमें खेद होगा और सदाके लिये इनके यशका नाश हो जायगा॥ ७९ ॥
‘अतः मैं एक मुहूर्ततक उनके छूटनेकी प्रतीक्षा करूँगा। फिर वे छूट जायँगे तो उनका पराक्रम देखूँगा। तबतक भागी हुई वानर-सेनाको धैर्य बँधाता हूँ’॥ ८० ॥
ऐसा विचारकर पवनकुमार हनुमान्ने वानरोंकी उस विशाल वाहिनीको पुनः आश्वासन दे स्थिरतापूर्वक स्थापित किया॥ ८१ ॥
उधर कुम्भकर्ण हाथ-पैर हिलाते हुए महावानर सुग्रीवको लिये-दिये लङ्कामें घुस गया। उस समय विमानों (सतमहले मकानों), सड़कके दोनों ओर बनी हुई गृहपंक्तियों तथा गोपुरोंमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष उत्तम फूलोंकी वर्षा करके कुम्भकर्णका स्वागत-सत्कार कर रहे थे॥ ८२ ॥
लावा और गन्धयुक्त जलकी वर्षाद्वारा अभिषिक्त हो राजमार्गकी शीतलताके कारण महाबली सुग्रीवको धीरे-धीरे होश आ गया॥ ८३ ॥
तब बड़ी कठिनाईसे सचेत हो बलवान् कुम्भकर्णकी भुजाओंमें दबे हुए महात्मा सुग्रीव नगर और राजमार्गकी ओर देखकर बारंबार इस प्रकार विचार करने लगे— ॥ ८४ ॥
‘इस प्रकार इस राक्षसकी पकड़में आकर अब मैं किस तरह इससे भरपूर बदला ले सकता हूँ? मैं वही करूँगा, जिससे वानरोंका अभीष्ट और हितकर कार्य हो’॥ ८५ ॥
ऐसा निश्चय करके वानरोंके राजा सुग्रीवने सहसा हाथोंके तीखे नखोंद्वारा इन्द्रशत्रु कुम्भकर्णके दोनों कान नोच लिये, दाँतोंसे उसकी नाक काट ली और अपने पैरोंके नखोंसे उस राक्षसकी दोनों पसलियाँ फाड़ डालीं॥ ८६ ॥
सुग्रीवके दाँतों और नखोंसे दोनों कानोंका निम्न भाग और नाक कट जाने तथा पार्श्वभागके विदीर्ण हो जानेसे कुम्भकर्णका सारा शरीर लहूलुहान हो गया। तब उसे बड़ा रोष हुआ और उसने सुग्रीवको घुमाकर भूमिपर पटक दिया। पटककर वह उन्हें भूमिपर रगड़ने लगा॥ ८७ ॥
भयानक बलशाली कुम्भकर्ण जब उन्हें पृथ्वीपर रगड़ रहा था और वे देवद्रोही राक्षस उनपर सब ओरसे चोट कर रहे थे, उसी समय सुग्रीव सहसा गेंदकी भाँति वेगपूर्वक आकाशमें उछले और पुनः श्रीरामचन्द्रजीसे आ मिले॥ ८८ ॥
महाबली कुम्भकर्ण अपनी नाक और कान खो बैठा। उसके अङ्गोंसे इस तरह खून बहने लगा, जैसे पर्वतसे पानीके झरने गिरते हैं। वह रक्तसे नहा उठा और झरनोंसे युक्त शैलशिखरकी भाँति शोभा पाने लगा॥
महाकाय राक्षस रक्तसे नहाकर और भी भयानक दिखायी देने लगा। उस निशाचरने पुनः शत्रुके सामने जाकर युद्ध करनेका विचार किया॥ ९० ॥
अमर्षपूर्वक रक्त वमन करता हुआ रावणका छोटा भार्इ कुम्भकर्ण, जिसके शरीरका रंग काले मेघके समान था, संध्याकालके बादलकी भाँति सुशोभित हो रहा था॥
सुग्रीवके निकल भागनेपर वह इन्द्रद्रोही राक्षस फिर युद्धके लिये दौड़ा। उस समय यह सोचकर कि ‘मेरे पास कोर्इ हथियार नहीं है’ उसने एक बड़ा भयंकर मुद्गर ले लिया॥ ९२ ॥
तदनन्तर महाबलशाली राक्षस कुम्भकर्ण सहसा लङ्कापुरीसे निकलकर प्रजाका भक्षण करनेवाली प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्निके समान उस भयंकर वानर-सेनाको युद्धस्थलमें अपना आहार बनाने लगा॥
उस समय कुम्भकर्णको भूख सता रही थी, अतएव वह रक्त और मांसके लिये लालायित हो रहा था। उसने उस भयंकर वानर-सेनामें प्रवेश करके मोहवश वानरों और भालुओंके साथ-साथ राक्षसों तथा पिशाचोंको भी खाना आरम्भ कर दिया। वह प्रधान-प्रधान वानरोंको उसी प्रकार अपना ग्रास बना रहा था, जैसे प्रलयकालमें मृत्यु प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करती है॥ ९४ ॥
वह बड़ी उतावलीके साथ एक हाथसे क्रोधपूर्वक एक, दो, तीन तथा बहुत-बहुत राक्षसों और वानरोंको समेटकर अपने मुँहमें झोंक लेता था॥ ९५ ॥
उस समय वह महाबली निशाचर पर्वत-शिखरोंकी मार खाता हुआ भी मुँहसे वानरोंकी चर्बी और रक्त गिराता हुआ उन सबका भक्षण कर रहा था॥ ९६ ॥
उसके द्वारा खाये जाते हुए वानर भयभीत हो उस समय भगवान् श्रीरामकी शरणमें गये। उधर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो वानरोंको अपना आहार बनाता हुआ सब ओर उनपर धावा करने लगा॥ ९७ ॥
वह सात, आठ, बीस, तीस तथा सौ-सौ वानरोंको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लेता और उन्हें खाता हुआ रणभूमिमें दौड़ता-फिरता था॥ ९८ ॥
उसके शरीरमें मेद, चर्बी और रक्त लिपटे हुए थे। उसके कानोंमें आँतोंकी मालाएँ उलझी हुर्इ थीं तथा उसकी दाढ़ें बहुत तीखी थीं। वह महाप्रलयके समय प्राणियोंका संहार करनेवाले विशाल रूपधारी कालके समान वानरोंपर शूलोंकी वर्षा कर रहा था॥ ९९ ॥
उस समय शत्रुनगरीपर विजय पाने तथा शत्रुओंका संहार करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण कुपित होकर उस राक्षसके साथ युद्ध करने लगे॥ १०० ॥
उन पराक्रमी लक्ष्मणने कुम्भकर्णके शरीरमें सात बाण धँसा दिये। फिर दूसरे बाण लिये और उन्हें भी उसपर छोड़ दिया॥ १०१ ॥
उनसे पीड़ित हुए उस राक्षसने लक्ष्मणके उस अस्त्रको निःशेष कर दिया। तब सुमित्राके आनन्दको बढ़ानेवाले बलवान् लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ॥ १०२ ॥
उन्होंने कुम्भकर्णके सुवर्णनिर्मित सुन्दर एवं दीप्तिमान् कवचको अपने बाणोंसे ढककर उसी तरह अदृश्य कर दिया, जैसे हवाने संध्याकालके बादलको उखाड़कर अदृश्य कर दिया हो॥ १०३ ॥
काले कोयलेके ढेरकी-सी कान्तिवाला कुम्भकर्ण लक्ष्मणके सुवर्णभूषित बाणोंसे आच्छादित हो मेघोंसे ढके हुए अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पा रहा था॥
तब उस भयंकर राक्षसने मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे सुमित्रानन्दन लक्ष्मणका तिरस्कार करते हुए कहा— ॥ १०५ ॥
‘लक्ष्मण! मैं युद्धमें यमराजको भी बिना कष्ट उठाये ही जीत लेनेकी शक्ति रखता हूँ। तुमने मेरे साथ निर्भय होकर युद्ध करते हुए अपनी अद्भुत वीरताका परिचय दिया है॥ १०६ ॥
‘जब मैं महासमरमें मृत्युके समान हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत होऊँ, उस समय जो मेरे सामने खड़ा रह जाय, वह भी प्रशंसाका पात्र है। फिर जो मुझे युद्ध प्रदान कर रहा हो, उसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ १०७ ॥
‘ऐरावतपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए शक्तिशाली इन्द्र भी पहले मेरे सामने युद्धमें नहीं ठहर सके हैं॥ १०८ ॥
‘सुमित्रानन्दन! तुमने बालक होकर भी आज अपने पराक्रमसे मुझे संतुष्ट कर दिया, अतः मैं तुम्हारी अनुमति लेकर युद्धके लिये श्रीरामके पास जाना चाहता हूँ॥ १०९ ॥
‘तुमने अपने वीर्य, बल और उत्साहसे रणभूमिमें मुझे संतोष प्रदान किया है; इसलिये अब मैं केवल रामको ही मारना चाहता हूँ, जिनके मारे जानेपर सारी शत्रुसेना स्वतः मर जायगी॥ ११० ॥
‘मेरे द्वारा रामके मारे जानेपर जो दूसरे लोग युद्धभूमिमें खड़े रहेंगे, उन सबके साथ मैं अपने संहारकारी बलके द्वारा युद्ध करूँगा’॥ १११ ॥
वह राक्षस जब पूर्वोक्त बात कह चुका, तब सुमित्राकुमार लक्ष्मण रणभूमिमें ठठाकर हँस पड़े और उससे प्रशंसा मिश्रित कठोर वाणीमें बोले— ॥ ११२ ॥
‘वीर कुम्भकर्ण! तुम महान् पौरुष पाकर जो इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी असह्य हो उठे हो, वह तुम्हारा कथन बिलकुल ठीक है, झूठ नहीं है। मैंने स्वयं अपनी आँखोंसे आज तुम्हारा पराक्रम देख लिया। ये रहे दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम, जो पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हैं’॥ ११३ १/२ ॥
लक्ष्मणकी यह बात सुनकर उसका आदर न करते हुए महाबली निशाचर कुम्भकर्णने सुमित्राकुमारको लाँघकर श्रीरामपर ही धावा किया। उस समय वह अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कम्पित-सी किये देता था॥
उसे आते देख दशरथनन्दन श्रीरामने रौद्रास्त्रका प्रयोग करके कुम्भकर्णके हृदयमें अनेक तीखे बाण मारे॥ ११६ ॥
श्रीरामके बाणोंसे घायल हो वह सहसा उनपर टूट पड़ा। उस समय क्रोधसे भरे हुए कुम्भकर्णके मुखसे अङ्गारमिश्रित आगकी लपटें निकल रही थीं॥ ११७ ॥
भगवान् श्रीरामके अस्त्रसे पीड़ित हो राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण घोर गर्जना करता और रणभूमिमें वानरोंको खदेड़ता हुआ क्रोधपूर्वक उनकी ओर दौड़ा॥ ११८ ॥
श्रीरामके बाणोंमें मोरके पंख लगे हुए थे। वे कुम्भकर्णकी छातीमें धँस गये। अतः व्याकुलताके कारण उसके हाथसे गदा छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ११९ ॥
इतना ही नहीं, उसके अन्य सब आयुध भी भूमिपर बिखर गये। जब उसने समझ लिया कि अब मेरे पास कोई हथियार नहीं है, तब उस महाबली निशाचरने दोनों मुक्कों और हाथोंसे ही वानरोंका महान् संहार आरम्भ किया॥ १२० १/२ ॥
बाणोंसे उसके सारे अङ्ग अत्यन्त घायल हो गये थे, इसलिये वह खूनसे नहा उठा और जैसे पर्वत झरने बहाता है, उसी तरह वह अपनी देहसे रक्तकी धारा बहाने लगा॥ १२१ ॥
वह खूनसे लथपथ और दुःसह क्रोधसे व्याकुल होकर वानरों, भालुओं तथा राक्षसोंको भी खाता हुआ चारों ओर दौड़ने लगा॥ १२२ ॥
इसी बीचमें यमराजके समान प्रतीत होनेवाले उस बलवान् एवं भयानक पराक्रमी निशाचरने एक भयंकर पर्वतका शिखर उठाया और उसे घुमाकर श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्य करके चला दिया॥ १२३ ॥
परंतु श्रीरामने पुनः धनुषका संधान करके सीधे जानेवाले सात बाण मारकर उस पर्वत-शिखरको बीचमें ही टूक-टूक कर डाला, अपने पासतक नहीं आने दिया॥
भरतके बड़े भाई धर्मात्मा श्रीरामने सुवर्णभूषित विचित्र बाणोंद्वारा जब उस महान् पर्वतशिखरको काट दिया, उस समय अपनी प्रभासे प्रकाशित-सा होते हुए उस मेरुपर्वतके शृङ्गसदृश शिखरने भूमिपर गिरते-गिरते दो सौ वानरोंको धराशायी कर दिया॥ १२५-१२६ ॥
उस समय धर्मात्मा लक्ष्मणने, जो कुम्भकर्णके वधके लिये नियुक्त थे, उसके वधकी अनेक युक्तियोंका विचार करते हुए श्रीरामसे कहा—॥ १२७ ॥
‘राजन्! यह राक्षस शोणितकी गन्धसे मतवाला हो गया है; अतः न वानरोंको पहचानता है न राक्षसोंको। अपने और पराये दोनों ही पक्षोंके योद्धाओंको खा रहा है॥ १२८ ॥
‘अतः श्रेष्ठ वानर-यूथपतियोंमें जो प्रधान लोग हैं, वे सब ओरसे इसके ऊपर चढ़ जायँ और इसके शरीरपर ही बैठे रहें॥ १२९ ॥
‘ऐसा होनेसे यह दुर्बुद्धि निशाचर इस समय भारी भारसे पीड़ित हो रणभूमिमें विचरण करते समय दूसरे वानरोंको नहीं मार सकेगा’॥ १३० ॥
बुद्धिमान् राजकुमार लक्ष्मणकी यह बात सुनकर वे महाबली वानर-यूथपति बड़े हर्षके साथ कुम्भकर्णपर चढ़ गये॥ १३१ ॥
वानरोंके चढ़ जानेपर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और जैसे बिगड़ैल हाथी महावतोंको गिरा देता है, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक वानरोंको अपनी देह हिलाकर गिरा दिया॥ १३२ ॥
उन सबको गिराया गया देख श्रीरामने यह समझ लिया कि कुम्भकर्ण रुष्ट हो गया है। फिर वे बड़े वेगसे उछलकर उस राक्षसकी ओर दौड़े और एक उत्तम धनुष हाथमें ले लिया॥ १३३ ॥
उस समय उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। वे धीर-वीर श्रीरघुनाथजी उसकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उसे अपनी दृष्टिसे दग्ध कर डालेंगे। उन्होंने कुम्भकर्णके बलसे पीड़ित समस्त वानरयूथपतियोंका हर्ष बढ़ाते हुए बड़े वेगसे उस राक्षसपर धावा किया॥ १३४ ॥
सुदृढ़ प्रत्यञ्चासे संयुक्त, सर्पके समान भयंकर और सुवर्णसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न उग्र धनुषको हाथमें लेकर श्रीरामने उत्तम तरकस और बाण बाँध लिये और वानरोंको आश्वासन देकर उन्होंने कुम्भकर्णपर बड़े वेगसे आक्रमण किया॥ १३५॥
उस समय अत्यन्त दुर्जय वानरसमूहोंने उन्हें चारों ओरसे घेर रखा था। लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। इस प्रकार वे महाबली वीर श्रीराम आगे बढ़े॥ १३६॥
उन महान् बलशाली श्रीरामने देखा, महाकाय शत्रुदमन कुम्भकर्ण मस्तकपर किरीट धारण किये सब ओर धावा कर रहा है। उसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे हैं। वह रोषसे भरे हुए दिग्गजकी भाँति क्रोधपूर्वक वानरोंको खोज रहा है और उन सबपर आक्रमण करता है। बहुत-से राक्षस उसे घेरे हुए हैं॥ १३७-१३८॥
वह विन्ध्य और मन्दराचलके समान जान पड़ता है। सोनेके बाजूबंद उसकी भुजाओंको विभूषित किये हुए हैं तथा वह (वर्षाकालमें) उमड़े हुए जलवर्षी मेघकी भाँति मुँहसे रक्तकी वर्षा कर रहा है॥ १३९॥
जिह्वाके द्वारा रक्तसे भीगे हुए जबड़े चाट रहा है और प्रलयकालके संहारकारी यमराजकी भाँति वानरोंकी सेनाको रौंद रहा है॥ १४०॥
इस प्रकार प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्णको देखकर पुरुषप्रवर श्रीरामने तत्काल अपना धनुष खींचा॥ १४१॥
उनके धनुषकी टंकार सुनकर राक्षसश्रेष्ठ कुम्भकर्ण कुपित हो उठा और उस टंकारध्वनिको सहन न करके श्रीरघुनाथजीकी ओर दौड़ा*॥ १४२॥
तदनन्तर जिनकी भुजाएँ नागराज वासुकिके समान विशाल और मोटी थीं, उन भगवान् श्रीरामने पवनकी प्रेरणासे उमड़े हुए मेघके समान काले और पर्वतके समान ऊँचे शरीरवाले कुम्भकर्णको आक्रमण करते देख रणभूमिमें उससे कहा—॥ १४३॥
‘राक्षसराज! आओ, विषाद न करो। मैं धनुष लेकर खड़ा हूँ। मुझे राक्षसवंशका विनाश करनेवाला समझो। अब तुम भी दो ही घड़ीमें अपनी चेतना खो बैठोगे (मर जाओगे)’॥ १४४॥
‘यही राम हैं’—यह जानकर वह राक्षस विकृत स्वरमें अट्टहास करने लगा और अत्यन्त कुपित हो रणक्षेत्रमें वानरोंको भगाता हुआ उनकी ओर दौड़ा॥ १४५॥
महातेजस्वी कुम्भकर्ण समस्त वानरोंके हृदयको विदीर्ण-सा करता हुआ विकृत स्वरमें जोर-जोरसे हँसकर मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर एवं भयंकर वाणीमें श्रीरघुनाथजीसे बोला— 'राम! मुझे विराध, कबन्ध और खर नहीं समझना चाहिये। मैं मारीच और वाली भी नहीं हूँ। यह कुम्भकर्ण तुमसे लड़ने आया है॥ १४६-१४७ ॥
'मेरे इस भयंकर एवं विशाल मुद्गरकी ओर देखो। यह सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ है। मैंने पूर्वकालमें इसीके द्वारा समस्त देवताओं और दानवोंको परास्त किया है॥ १४८ ॥
'मेरे नाक-कान नीचेसे कट गये हैं, ऐसा समझकर तुम्हें मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। इन दोनों अङ्गोंके नष्ट होनेसे मुझे थोड़ी-सी भी पीड़ा नहीं होती है॥
'निष्पाप रघुनन्दन! तुम इक्ष्वाकुवंशके वीर पुरुष हो, अतः मेरे अङ्गोंपर अपना पराक्रम दिखाओ। तुम्हारे पौरुष एवं बल-विक्रमको देख लेनेके बाद ही मैं तुम्हें खाऊँगा'॥ १५० ॥
कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर श्रीरामने उसके ऊपर सुन्दर पंखवाले बहुत-से बाण मारे। वज्रके समान वेगवाले उन बाणोंकी गहरी चोट खानेपर भी वह देवद्रोही राक्षस न तो क्षुब्ध हुआ और न व्यथित ही॥
जिन बाणोंसे श्रेष्ठ सालवृक्ष काटे गये और वानरराज वालीका वध हुआ, वे ही वज्रोपम बाण उस समय कुम्भकर्णके शरीरको व्यथा न पहुँचा सके॥ १५२ ॥
देवराज इन्द्रका शत्रु कुम्भकर्ण जलकी धाराके समान श्रीरामकी बाणवर्षाको अपने शरीरसे पीने लगा और भयंकर वेगशाली मुद्गरको चारों ओरसे घुमाघु माकर उनके बाणोंके महान् वेगको नष्ट करने लगा॥
तदनन्तर वह राक्षस देवताओंकी विशाल सेनाको भयभीत करनेवाले और खूनसे लिपटे हुए उस उग्र वेगशाली मुद्गरको घुमा-घुमाकर वानरोंकी वाहिनीको खदेड़ने लगा॥ १५४ ॥
यह देख भगवान् श्रीरामने वायव्य नामक दूसरे अस्त्रका संधान करके उसे कुम्भकर्णपर चलाया और उसके द्वारा उस निशाचरकी मुद्गरसहित दाहिनी बाँह काट डाली। बाँह कट जानेपर वह राक्षस भयानक आवाजमें चीत्कार करने लगा॥ १५५ ॥
श्रीरघुनाथजीके बाणसे कटी हुर्इ वह बाँह, जो पर्वतशिखरके समान जान पड़ती थी, मुद्गरके साथ ही वानरोंकी सेनामें गिरी। उसके नीचे दबकर कितने ही वानर-सैनिक अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे॥ १५६ ॥
जो अङ्ग-भङ्ग होने या मरनेसे बचे, वे खिन्नचित्त हो किनारे जाकर खड़े हो गये। उनके शरीरमें बड़ी पीड़ा हो रही थी और वे चुपचाप महाराज श्रीराम और राक्षस कुम्भकर्णके घोर संग्रामको देखने लगे॥ १५७ ॥
वायव्यास्त्रसे एक बाँह कट जानेपर कुम्भकर्ण शिखरहीन पर्वतके समान प्रतीत होने लगा। उसने एक ही हाथसे एक ताड़का वृक्ष उखाड़ लिया और उसे लेकर रणभूमिमें महाराज श्रीरामपर धावा किया॥ १५८ ॥
तब श्रीरामने एक सुवर्णभूषित बाण निकालकर उसे ऐन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसके द्वारा सर्पके समान उठी हुई राक्षसकी दूसरी बाँहको भी वृक्षसहित काट गिराया॥ १५९ ॥
कुम्भकर्णकी वह कटी हुई बाँह पर्वत-शिखरके समान पृथ्वीपर गिरी और छटपटाने लगी। उसने कितने ही वृक्षों, शैलशिखरों, शिलाओं, वानरों और राक्षसोंको भी कुचल डाला॥ १६० ॥
उन दोनों भुजाओंके कट जानेपर वह राक्षस सहसा आर्तनाद करता हुआ श्रीरामपर टूट पड़ा। उसे आक्रमण करते देख श्रीरामने दो तीखे अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उनके द्वारा युद्धस्थलमें उस राक्षसके दोनों पैर भी उड़ा दिये॥ १६१ ॥
उसके दोनों पैर दिशा-विदिशा, पर्वतकी कन्दरा, महासागर, लङ्कापुरी तथा वानरों और राक्षसोंकी सेनाओंको भी प्रतिध्वनित करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १६२ ॥
दोनों बाँहों और पैरोंके कट जानेपर उसने वडवानलके समान अपने विकराल मुखको फैलाया और जैसे राहु आकाशमें चन्द्रमाको ग्रस लेता है, उसी प्रकार वह श्रीरामको ग्रसनेके लिये भयानक गर्जना करता हुआ सहसा उनके ऊपर टूट पड़ा॥ १६३ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णजटित पंखवाले अपने तीखे बाणोंसे उसका मुँह भर दिया। मुँह भर जानेपर वह बोलनेमें भी असमर्थ हो गया और बड़ी कठिनाईसे आर्तनाद करके मूर्च्छित हो गया॥ १६४ ॥
इसके बाद भगवान् श्रीरामने ब्रह्मदण्ड तथा विनाशकारी कालके समान भयंकर एवं तीखा बाण, जो सूर्यकी किरणोंके समान उद्दीप्त, इन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित, शत्रुनाशक, तेजस्वी सूर्य और प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान, हीरे और सुवर्णसे विभूषित सुन्दर पंखसे युक्त, वायु तथा
इन्द्रके वज्र और अशनिके समान वेगशाली था, हाथमें लिया और उस निशाचरको लक्ष्य करके छोड़ दिया॥ १६५-१६६ ॥
श्रीरघुनाथजीकी भुजाओंसे प्रेरित होकर वह बाण अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर वेगसे चला। वह धूमरहित अग्निके समान भयानक दिखायी देता था॥ १६७ ॥
जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका मस्तक काट डाला था, उसी प्रकार उस बाणने राक्षसराज कुम्भकर्णके महान् पर्वतशिखरके समान ऊँचे, सुन्दर गोलाकार दाढ़ोंसे युक्त तथा हिलते हुए मनोहर कुण्डलोंसे अलंकृत मस्तकको धड़से अलग कर दिया॥ १६८ ॥
कुम्भकर्णका वह कुण्डलोंसे अलंकृत विशाल मस्तक प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर आकाशके मध्यमें विराजमान चन्द्रमाकी भाँति निस्तेज प्रतीत होता था॥ १६९ ॥
श्रीरामके बाणोंसे कटा हुआ राक्षसका वह पर्वताकार मस्तक लङ्कामें जा गिरा। उसने अपने धक्केसे सड़कके आस-पासके कितने ही मकानों, दरवाजों और ऊँचे परकोटेको भी धराशायी कर दिया॥ १७० ॥
इसी प्रकार उस राक्षसका विशाल धड़ भी, जो हिमालयके समान जान पड़ता था, तत्काल समुद्रके जलमें गिर पड़ा और बड़े-बड़े ग्राहों, मत्स्यों तथा साँपोंको पीसता हुआ पृथ्वीके भीतर समा गया॥ १७१ ॥
ब्राह्मणों और देवताओंके शत्रु महाबली कुम्भकर्णके युद्धमें मारे जानेपर पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत हिलने लगे और सम्पूर्ण देवता हर्षसे भरकर तुमुल नाद करने लगे॥
उस समय आकाशमें खड़े हुए देवर्षि, महर्षि, सर्प, देवता, भूतगण, गरुड़, गुह्यक, यक्ष और गन्धर्वगण श्रीरामका पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हुए॥ १७३ ॥
कुम्भकर्णके महान् वधसे राक्षसराज रावणके मनस्वी बन्धुओंको बड़ा दुःख हुआ। वे रघुकुलतिलक श्रीरामकी ओर देखकर उसी तरह उच्च स्वरसे रोने-कल्पने लगे, जैसे सिंहपर दृष्टि पड़ते ही मतवाले हाथी चीत्कार कर उठते हैं॥ १७४ ॥
देवसमूहको दुःख देनेवाले कुम्भकर्णका युद्धमें वध करके वानर-सेनाके बीचमें खड़े हुए भगवान् श्रीराम अन्धकारका नाश करके राहुके मुखसे छूटे हुए सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ १७५ ॥
भयानक बलशाली शत्रुके मारे जानेसे बहुसंख्यक वानरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके मुख विकसित कमलकी भाँति हर्षोल्लाससे खिल उठे तथा उन्होंने सफलमनोरथ हुए राजकुमार भगवान् श्रीरामकी भूरिभूरि प्रशंसा की॥ १७६ ॥
जो बड़े-बड़े युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुआ था तथा देवताओंकी सेनाको भी कुचल डालनेवाला था, उस महान् राक्षस कुम्भकर्णको रणभूमिमें मारकर रघुनाथजीको वैसी ही प्रसन्नता हुई जैसी वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको हुई थी॥ १७७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७ ॥
* इस श्लोकके बाद कुछ प्रतियोंमें निम्नाङ्कित श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं, जो उपयोगी होनेसे यहाँ अर्थसहित दिये जा रहे हैं—
पुरस्ताद् राघवस्यार्थे गदायुक्तो विभीषणः। अभिदुद्राव वेगेन भ्राता भ्रातरमाहवे॥
विभीषणं पुरो दृष्ट्वा कुम्भकर्णोऽब्रवीदिदम्। प्रहरस्व रणे शीघ्रं क्षत्रधर्मे स्थिरो भव॥
भ्रातृस्नेहं परित्यज्य राघवस्य प्रियं कुरु। अस्मत्कार्यं कृतं वत्स यस्त्वं राममुपागतः॥
त्वमेको रक्षसां लोके सत्यधर्माभिरक्षिता। नास्ति धर्माभिरक्तानां व्यसनं तु कदाचन॥
संतानार्थं त्वमेवैकः कुलस्यास्य भविष्यसि। राघवस्य प्रसादात् त्वं रक्षसां राज्यमाप्स्यसि॥
प्रकृत्या मम दुर्धर्ष शीघ्रं मार्गादपक्रम। न स्थातव्यं पुरस्तान्मे सम्भ्रमान्नष्टचेतसः॥
न वेद्मि संयुगे सक्तः स्वान् परान् वा निशाचर। रक्षणीयोऽसि मे वत्स सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥
एवमुक्तो वचस्तेन कुम्भकर्णेन धीमता। विभीषणो महाबाहुः कुम्भकर्णमुवाच ह॥
गदितं मे कुलस्यास्य रक्षणार्थमरिंदम। न श्रुतं सर्वरक्षोभिस्ततोऽहं राममागतः॥
कृतं तु तन्महाभाग सुकृतं दुष्कृतं तु वा। एवमुक्त्वाश्रुपूर्णाक्षो गदापाणिर्विभीषणः।
एकान्तमाश्रितो भूत्वा चिन्तयामास संस्थितः॥
तब श्रीरामचन्द्रजीके लिये युद्ध करनेके निमित्त गदा हाथमें लिये विभीषण उनके आगे आकर खड़े हो गये और उस युद्धस्थलमें भाई होकर भाईका सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़े। विभीषणको सामने देखकर कुम्भकर्णने इस प्रकार कहा— ‘वत्स ! तुम भाईका स्नेह छोड़कर श्रीरघुनाथजीका प्रिय करो और रणभूमिमें शीघ्र मेरे ऊपर गदा चलाओ। इस समय तुम क्षात्रधर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थिर रहो। तुम जो श्रीरामकी शरणमें आ गये, इससे तुमने हमलोगोंका काम बना दिया। राक्षसोंमें एक तुम्हीं ऐसे हो, जिसने इस जगत्में सत्य और धर्मकी रक्षा की है। जो धर्ममें अनुरक्त होते हैं, उन्हें कभी कोई दुःख नहीं भोगना पड़ता है। अब एकमात्र तुम्हीं इस कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये जीवित रहोगे। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे
तुम्हें राक्षसोंका राज्य प्राप्त होगा। दुर्जय वीर ! मेरी प्रकृतिसे तो तुम परिचित ही हो; अतः शीघ्र मेरा रास्ता छोड़कर दूर हट जाओ। इस समय सम्भ्रमके कारण मेरी विचारशक्ति नष्ट हो गयी है; अतः तुम्हें मेरे सामने नहीं खड़ा होना चाहिये। निशाचर ! इस समय युद्धमें आसक्त होनेके कारण मुझे अपने अथवा परायेकी पहचान नहीं हो रही है, तथापि वत्स ! तुम मेरे लिये रक्षणीय हो—मैं तुम्हारा वध करना नहीं चाहता। यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ।' बुद्धिमान् कुम्भकर्णके ऐसा कहनेपर महाबाहु विभीषणने उससे कहा—'शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर ! मैंने इस कुलकी रक्षाके लिये बहुत कुछ कहा था; किंतु समस्त राक्षसोंने मेरी बात नहीं सुनी; अतः मैं निराश होकर श्रीरामकी शरणमें आ गया। महाभाग ! यह मेरे लिये पुण्य हो या पाप। अब मैंने श्रीरामका आश्रय तो ग्रहण कर ही लिया।' ऐसा कहकर गदाधारी विभीषणके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे एकान्तका आश्रय ले खड़े होकर चिन्ता करने लगे।
अड़सठवाँ सर्ग
अड़सठवाँ सर्ग
कुम्भकर्णके वधका समाचार सुनकर रावणका विलाप
महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा कुम्भकर्णको मारा गया देख राक्षसोंने अपने राजा रावणसे जाकर कहा— ॥ १ ॥
‘महाराज! कालके समान भयंकर पराक्रमी कुम्भकर्ण वानरसेनाको भगाकर तथा बहुत-से वानरोंको अपना आहार बनाकर स्वयं भी कालके गालमें चले गये॥ २ ॥
‘वे दो घड़ीतक अपने प्रतापसे तपकर अन्तमें श्रीरामके तेजसे शान्त हो गये। उनका आधा शरीर (धड़) भयानक दिखायी देनेवाले समुद्रमें घुस गया और आधा शरीर (मस्तक) नाक-कान कट जानेसे खून बहाता हुआ लङ्काके द्वारपर पड़ा है। उस शरीरके द्वारा आपके भाई पर्वताकार कुम्भकर्ण लङ्काका द्वार रोककर पड़े हैं। वे श्रीरामके बाणोंसे पीड़ित हो हाथ, पैर और मस्तकसे हीन नंग-धड़ंग धड़के रूपमें परिणत हो दावानलसे दग्ध हुए वृक्षकी भाँति नष्ट हो गये’॥ ३–५ ॥
‘महाबली कुम्भकर्ण युद्धस्थलमें मारा गया’ यह सुनकर रावण शोकसे संतप्त एवं मूर्च्छित हो गया और तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६ ॥
अपने चाचाके निधनका समाचार सुनकर देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय दुःखसे पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे॥ ७ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा भाई कुम्भकर्ण मारे गये, यह सुनकर उसके सौतेले भाई महोदर और महापार्श्व शोकसे व्याकुल हो गये॥ ८ ॥
तदनन्तर बड़े कष्टसे होशमें आनेपर राक्षसराज रावण कुम्भकर्णके वधसे दुःखी हो विलाप करने लगा। उसकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं॥ ९ ॥
(वह रो-रोकर कहने लगा—) ‘हा वीर! हा महाबली कुम्भकर्ण! तुम शत्रुओंके दर्पका दलन करनेवाले थे; किंतु दुर्भाग्यवश मुझे असहाय छोड़कर यमलोकको चल दिये॥ १० ॥
‘महाबली वीर! तुम मेरा तथा इन भाई-बन्धुओंका कण्टक दूर किये बिना शत्रुसेनाको संतप्त करके मुझे छोड़ अकेले कहाँ चले जा रहे हो?॥ ११ ॥
‘इस समय मैं अवश्य ही नहींके बराबर हूँ; क्योंकि मेरी दाहिनी बाँह कुम्भकर्ण धराशायी हो गया। जिसका भरोसा करके मैं देवता और असुर किसीसे नहीं डरता था॥ १२ ॥
‘देवताओं और दानवोंका दर्प चूर करनेवाला ऐसा वीर, जो कालाग्निके समान प्रतीत होता था, आज रणक्षेत्रमें रामके हाथसे कैसे मारा गया?॥ १३ ॥
‘भाई! तुम्हें तो वज्रका प्रहार भी कभी कष्ट नहीं पहुँचा सकता था। वही तुम आज रामके बाणोंसे पीड़ित हो भूतलपर कैसे सो रहे हो?॥ १४ ॥
‘आज समराङ्गणमें तुम्हें मारा गया देख आकाशमें खड़े हुए ये ऋषियोंसहित देवता हर्षनाद कर रहे हैं॥
‘निश्चय ही अब अवसर पाकर हर्षसे भरे हुए वानर आज ही लङ्काके समस्त दुर्गम द्वारोंपर चढ़ जायँगे॥ १६ ॥
‘अब मुझे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। सीताको लेकर भी मैं क्या करूँगा? कुम्भकर्णके बिना जीनेका मेरा मन नहीं है॥ १७ ॥
‘यदि मैं युद्धस्थलमें अपने भाईका वध करनेवाले रामको नहीं मार सकता तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। इस निरर्थक जीवनको सुरक्षित रखना कदापि अच्छा नहीं है॥ १८ ॥
‘मैं आज ही उस देशको जाऊँगा, जहाँ मेरा छोटा भाई कुम्भकर्ण गया है। मैं अपने भाइयोंको छोड़कर क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता॥ १९ ॥
‘मैंने पहले देवताओंका अपकार किया था। अब वे मुझे देखकर हँसेंगे। हा कुम्भकर्ण! तुम्हारे मारे जानेपर अब मैं इन्द्रको कैसे जीत सकूँगा?॥ २० ॥
‘मैंने महात्मा विभीषणकी कही हुई जिन उत्तम बातोंको अज्ञानवश स्वीकार नहीं किया था, वे मेरे ऊपर आज प्रत्यक्षरूपसे घटित हो रही हैं॥ २१ ॥
‘जबसे कुम्भकर्ण और प्रहस्तका यह दारुण विनाश उत्पन्न हुआ है, तभीसे विभीषणकी बात याद आकर मुझे लज्जित कर रही है॥ २२ ॥
‘मैंने धर्मपरायण श्रीमान् विभीषणको जो घरसे निकाल दिया था, उसी कर्मका यह शोकदायक परिणाम अब मुझे भोगना पड़ रहा है’॥ २३ ॥
इस प्रकार भाँति-भाँतिसे दीनतापूर्वक अत्यन्त विलाप करके व्याकुलचित्त हुआ दशमुख रावण अपने छोटे भाई इन्द्र-शत्रु कुम्भकर्णके वधका स्मरण करके बहुत ही व्यथित हो पुनः
पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८ ॥
उनहत्तरवाँ सर्ग
उनहत्तरवाँ सर्ग
रावणके पुत्रों और भाइयोंका युद्धके लिये जाना और नरान्तकका अङ्गदके द्वारा वध
दुरात्मा रावण जब शोकसे पीड़ित हो इस प्रकार विलाप करने लगा, तब त्रिशिराने कहा—॥ १ ॥
‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हमारे मझले चाचा, जो इस समय युद्धमें मारे गये हैं, ऐसे ही महान् पराक्रमी थे; परंतु आप जिस प्रकार रोते-कलपते हैं, उस तरह श्रेष्ठ पुरुष किसीके लिये विलाप नहीं करते हैं॥ २ ॥
‘प्रभो! निश्चय आप अकेले ही तीनों लोकोंसे भी लोहा लेनेमें समर्थ हैं; फिर इस तरह साधारण पुरुषकी भाँति क्यों अपने-आपको शोकमें डाल रहे हैं?॥ ३ ॥
‘आपके पास ब्रह्माजीकी दी हुई शक्ति, कवच, धनुष तथा बाण हैं; साथ ही मेघ-गर्जनाके समान शब्द करनेवाला रथ भी है, जिसमें एक हजार गदहे जोते जाते हैं॥ ४ ॥
‘आपने एक ही शस्त्रसे देवताओं और दानवोंको अनेक बार पछाड़ा है, अतः सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होनेपर आप रामको भी दण्ड दे सकते हैं॥ ५ ॥
‘अथवा महाराज! आपकी इच्छा हो तो यहीं रहें। मैं स्वयं युद्धके लिये जाऊँगा और जैसे गरुड़ सर्पोंका संहार करते हैं, उसी तरह मैं आपके शत्रुओंको जड़से उखाड़ फेंकूँगा॥ ६ ॥
‘जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको और भगवान् विष्णुने नरकासुरको* मार गिराया था, उसी प्रकार युद्धस्थलमें आज मेरे द्वारा मारे जाकर राम सदाके लिये सो जायँगे’॥ ७ ॥
त्रिशिराकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणको इतना संतोष हुआ कि वह अपना नया जन्म हुआ-सा मानने लगा। कालसे प्रेरित होकर ही उसकी ऐसी बुद्धि हो गयी॥ ८ ॥
त्रिशिराका उपर्युक्त कथन सुनकर देवान्तक, नरान्तक और तेजस्वी अतिकाय—ये तीनों युद्धके लिये उत्साहित हो गये॥ ९ ॥
‘मैं युद्धके लिये जाऊँगा, मैं जाऊँगा’ ऐसा कहते और गर्जते हुए वे तीनों श्रेष्ठ निशाचर युद्धके लिये तैयार हो गये। रावणके वे वीर पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी थे॥
वे सब-के-सब आकाशमें विचरण करनेवाले, मायाविशारद, रणदुर्मद तथा देवताओंका भी दर्प दलन करनेवाले थे॥ ११ ॥
वे सभी उत्तम बलसे सम्पन्न थे। उन सबकी कीर्ति तीनों लोकोंमें फैली हुई थी और समरभूमिमें आनेपर गन्धर्वों, किन्नरों तथा बड़े-बड़े नागोंसहित देवताओंसे भी कभी उन सबकी पराजय नहीं सुनी गयी थी। वे सभी अस्त्रवेत्ता, सभी वीर और सभी युद्धकी कलामें निपुण थे। उन सबको शस्त्रों और शास्त्रोंका उत्तम ज्ञान प्राप्त था और सबने तपस्याके द्वारा वरदान प्राप्त किया था॥ १२-१३ ॥
सूर्यके समान तेजस्वी तथा शत्रुओंकी सेना और सम्पत्तिको रौंद डालनेवाले उन पुत्रोंसे घिरा हुआ राक्षसोंका राजा रावण बड़े-बड़े दानवोंका दर्प चूर्ण करनेवाले देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहा था॥
उसने अपने पुत्रोंको हृदयसे लगाकर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित किया और उत्तम आशीर्वाद देकर रणभूमिमें भेजा॥ १५ ॥
रावणने अपने दोनों भाई युद्धोन्मत्त (महापार्श्व) और मत्त (महोदर)-को भी युद्धमें कुमारोंकी रक्षाके लिये भेजा॥ १६ ॥
वे सभी महाकाय राक्षस समस्त लोकोंको रुलानेवाले महामना रावणको प्रणाम और उसकी परिक्रमा करके युद्धके लिये प्रस्थित हुए॥ १७ ॥
सब प्रकारकी ओषधियों तथा गन्धोंका स्पर्श करके युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक, नरान्तक, महोदर और महापार्श्व—ये छः महाबली श्रेष्ठ निशाचर कालसे प्रेरित हो युद्धके लिये पुरीसे बाहर निकले॥ १९ ॥
उस समय महोदर ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुए काले मेघके समान रंगवाले ‘सुदर्शन’ नामक हाथीपर सवार हुआ॥ २० ॥
समस्त आयुधोंसे सम्पन्न और तूणीरोंसे अलंकृत महोदर उस हाथीकी पीठपर बैठकर अस्ताचलके शिखरपर विराजमान सूर्यदेवके समान शोभा पा रहा था॥ २१ ॥
रावणकुमार त्रिशिरा एक उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र रखे गये थे और उत्तम घोड़े जुते हुए थे॥ २२ ॥
उस रथमें बैठकर धनुष धारण किये त्रिशिरा विद्युत्, उल्का, ज्वाला और इन्द्रधनुषसे युक्त मेघके समान शोभा पाने लगा॥ २३ ॥
उस उत्तम रथमें सवार हो तीन किरीटोंसे युक्त त्रिशिरा तीन सुवर्णमय शिखरोंसे युक्त गिरिराज हिमालयके समान शोभा पा रहा था॥ २४ ॥
राक्षसराज रावणका अत्यन्त तेजस्वी पुत्र अतिकाय समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ था। वह भी उस समय एक उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ॥ २५ ॥
उस रथके पहिये और धुरे बहुत सुन्दर थे। उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे तथा उसके अनुकर्ष^१ और कूबर^२ भी सुदृढ़ थे। तूणीर, बाण और धनुषके कारण वह रथ उद्दीप्त हो रहा था। प्रास, खड्ग और परिघोंसे वह भरा हुआ था॥ २६ ॥
वह सुवर्णनिर्मित विचित्र एवं दीप्तिशाली किरीट तथा अन्य आभूषणोंसे विभूषित हो अपनी प्रभासे प्रकाशका विस्तार करते हुए मेरुपर्वतके समान सुशोभित होता था॥ २७ ॥
उस रथपर श्रेष्ठ निशाचरोंसे घिरकर बैठा हुआ वह महाबली राक्षसराजकुमार देवताओंसे घिरे हुए वज्रपाणि इन्द्रके समान शोभा पाता था॥ २८ ॥
नरान्तक उच्चैःश्रवाके समान श्वेत वर्णवाले एक सुवर्णभूषित विशालकाय और मनके समान वेगशाली अश्वपर आरूढ़ हुआ॥ २९ ॥
उल्काके समान दीप्तिमान् प्रास हाथमें लेकर तेजस्वी नरान्तक शक्ति लिये मोरपर बैठे हुए तेजःपुञ्जसे सम्पन्न कुमार कार्तिकेयके समान सुशोभित हो रहा था॥ ३० ॥
देवान्तक स्वर्णभूषित परिघ लेकर समुद्रमन्थनके समय दोनों हाथोंसे मन्दराचल उठाये हुए भगवान् विष्णुके स्वरूपका अनुकरण-सा कर रहा था॥ ३१ ॥
महातेजस्वी और पराक्रमी महापार्श्व हाथमें गदा लेकर युद्धस्थलमें गदाधारी कुबेरके समान शोभा पाने लगा॥
अमरावतीपुरीसे निकलनेवाले देवताओंके समान वे सभी महाकाय निशाचर लङ्कापुरीसे चले। उनके पीछे श्रेष्ठ आयुध धारण किये विशालकाय राक्षस हाथी, घोड़ों तथा मेघकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाले रथोंपर सवार हो युद्धके लिये निकले॥ ३३ १/२ ॥
वे सूर्यतुल्य तेजस्वी, महामनस्वी राक्षसराजकुमार मस्तकपर किरीट धारण करके उत्तम शोभा-सम्पत्तिसे सेवित हो आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ग्रहोंके समान सुशोभित हो रहे थे॥ ३४ १/२ ॥
उनके द्वारा धारण की हुई अस्त्र-शस्त्रोंकी श्वेत पंक्ति आकाशमें शरद्ऋतुके बादलोंकी भाँति उज्ज्वल कान्तिसे युक्त हंसोंकी श्रेणीके समान शोभा पा रही थी॥ ३५ १/२ ॥
आज या तो हम शत्रुओंको परास्त कर देंगे, या स्वयं ही मृत्युकी गोदमें सदाके लिये सो जायँगे—ऐसा निश्चय करके वे वीर राक्षस युद्धके लिये आगे बढ़े॥
वे युद्धदुर्मद महामनस्वी निशाचर गर्जते, सिंहनाद करते, बाण हाथमें लेते और उन्हें शत्रुओंपर छोड़ देते थे॥ ३७ १/२ ॥
उन राक्षसोंके गर्जने, ताल ठोंकने और सिंहनाद करनेसे पृथ्वी कम्पित-सी होने लगी और आकाश फटने-सा लगा॥ ३८ १/२ ॥
उन महाबली राक्षसशिरोमणि वीरोंने प्रसन्नतापूर्वक नगरकी सीमासे बाहर निकलकर देखा, वानरोंकी सेना पर्वत-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठाये युद्धके लिये तैयार खड़ी है॥ ३९ १/२ ॥
महामना वानरोंने भी राक्षससेनापर दृष्टिपात किया। वह हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी थी, सैकड़ों-हजारों घुंघुरुओंकी रुनझुनसे निनादित थी, काले मेघोंकी घटा-जैसी दिखायी देती थी और हाथोंमें बड़े-बड़े आयुध लिये हुए थी॥ ४०-४१ ॥
प्रज्वलित अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी राक्षसोंने उसे सब ओरसे घेर रखा था। निशाचरोंकी उस सेनाको आती देख वानर प्रहार करनेका अवसर पाकर महान् पर्वतशिखर उठाये बारंबार गर्जना करने लगे। वे राक्षसोंका सिंहनाद सहन न करनेके कारण बदलेमें जोर-जोरसे दहाड़ने लगे थे॥ ४२-४३ ॥
वानरयूथपतियोंका वह उच्च स्वरसे किया हुआ गर्जन-तर्जन सुनकर भयंकर एवं महान् बलसे सम्पन्न राक्षसगण शत्रुओंका हर्ष सहन न कर सके; अतः स्वयं भी अत्यन्त भीषण सिंहनाद करने लगे॥ ४४ ॥
तब वानर-यूथपति राक्षसोंकी उस भयंकर सेनामें घुस गये और शैलशृङ्ग उठाये शिखरोंवाले पर्वतोंकी भाँति वहाँ विचरण करने लगे॥ ४५ ॥
वृक्षों और शिलाओंको आयुधके रूपमें धारण किये वानर योद्धा राक्षससैनिकोंपर अत्यन्त कुपित हो आकाशमें उड़-उड़कर विचरने लगे। कितने ही वानरशिरोमणि वीर मोटी-मोटी शाखाओंवाले वृक्षोंको हाथमें लेकर पृथ्वीपर विचरण करने लगे॥ ४६ १/२ ॥
उस समय राक्षसों और वानरोंके उस युद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया। राक्षसोंके बाणसमूहोंकी वर्षाद्वारा जब वानरोंको आगे बढ़नेसे रोका, उस समय वे भयंकर पराक्रमी वानर उनपर वृक्षों, शिलाओं तथा शैल-शिखरोंकी अनुपम वृष्टि करने लगे॥ ४७-४८ ॥
राक्षस और वानर दोनों ही वहाँ रणक्षेत्रमें सिंहोंके समान दहाड़ रहे थे। कुपित हुए वानरोंने कवचों और आभूषणोंसे विभूषित बहुतेरे राक्षसोंको युद्धस्थलमें शिलाओंकी मारसे कुचल दिया—मार डाला॥ ४९ १/२ ॥
कितने ही वानर रथ, हाथी और घोड़ेपर बैठे हुए वीर राक्षसोंको भी सहसा उछलकर मार डालते थे॥
वहाँ प्रधान-प्रधान राक्षसोंके शरीर पर्वत-शिखरोंसे आच्छादित हो गये थे। वानरोंके मुक्कोंकी मार खाकर कितनोंकी आँखें बाहर निकल आयी थीं। वे निशाचर भागते, गिरते-पड़ते और चीत्कार करते थे॥ ५१ १/२ ॥
राक्षसोंने भी पैने बाणोंसे कितने ही वानरशिरोमणियोंको विदीर्ण कर दिया था तथा शूलों, मुद्गरों, खड्गों, प्रासों और शक्तियोंसे बहुतोंको मार गिराया था॥
शत्रुओंके रक्त जिनके शरीरोंमें लिपटे हुए थे, वे वानर और राक्षस वहाँ परस्पर विजय पानेकी इच्छासे एक-दूसरेको धराशायी कर रहे थे॥ ५३ १/२ ॥
थोड़ी ही देरमें वह युद्धभूमि वानरों और राक्षसोंद्वारा चलाये गये पर्वत-शिखरों तथा तलवारोंसे आच्छादित हो रक्तके प्रवाहसे सिंच उठी॥ ५४ १/२ ॥
युद्धके मदसे उन्मत्त हुए पर्वताकार राक्षस जो शिलाओंकी मारसे कुचल दिये गये थे, सब ओर बिखरे पड़े थे। उनसे वहाँकी सारी भूमि पट गयी थी॥ ५५ ॥
राक्षसोंने जिनके युद्धके साधनभूत शैल-शिखरोंको तोड़-फोड़ डाला था, वे वानर उनके प्रहारोंसे विचलित किये जानेपर उन राक्षसोंके अत्यन्त निकट जा अपने हाथ-पैर आदि अङ्गोंद्वारा ही अद्भुत युद्ध करने लगे॥ ५६ ॥
राक्षसोंके प्रधान-प्रधान वीर वानरोंको पकड़कर उन्हें दूसरे वानरोंपर पटक देते थे। इसी प्रकार वानर भी राक्षसोंसे ही राक्षसोंको मार रहे थे॥ ५७ ॥
उस समय राक्षस अपने शत्रुओंके हाथसे शिलाओं और शैल-शिखरोंको छीनकर उन्हींसे उनपर प्रहार करने लगे तथा वानर भी राक्षसोंके हथियार छीनकर उन्हींके द्वारा उनका वध करने