भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1959, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1959

सुदृढ़ प्रत्यञ्चासे संयुक्त, सर्पके समान भयंकर और सुवर्णसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न उग्र धनुषको हाथमें लेकर श्रीरामने उत्तम तरकस और बाण बाँध लिये और वानरोंको आश्वासन देकर उन्होंने कुम्भकर्णपर बड़े वेगसे आक्रमण किया॥ १३५॥

उस समय अत्यन्त दुर्जय वानरसमूहोंने उन्हें चारों ओरसे घेर रखा था। लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। इस प्रकार वे महाबली वीर श्रीराम आगे बढ़े॥ १३६॥

उन महान् बलशाली श्रीरामने देखा, महाकाय शत्रुदमन कुम्भकर्ण मस्तकपर किरीट धारण किये सब ओर धावा कर रहा है। उसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे हैं। वह रोषसे भरे हुए दिग्गजकी भाँति क्रोधपूर्वक वानरोंको खोज रहा है और उन सबपर आक्रमण करता है। बहुत-से राक्षस उसे घेरे हुए हैं॥ १३७-१३८॥

वह विन्ध्य और मन्दराचलके समान जान पड़ता है। सोनेके बाजूबंद उसकी भुजाओंको विभूषित किये हुए हैं तथा वह (वर्षाकालमें) उमड़े हुए जलवर्षी मेघकी भाँति मुँहसे रक्तकी वर्षा कर रहा है॥ १३९॥

जिह्वाके द्वारा रक्तसे भीगे हुए जबड़े चाट रहा है और प्रलयकालके संहारकारी यमराजकी भाँति वानरोंकी सेनाको रौंद रहा है॥ १४०॥

इस प्रकार प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्णको देखकर पुरुषप्रवर श्रीरामने तत्काल अपना धनुष खींचा॥ १४१॥

उनके धनुषकी टंकार सुनकर राक्षसश्रेष्ठ कुम्भकर्ण कुपित हो उठा और उस टंकारध्वनिको सहन न करके श्रीरघुनाथजीकी ओर दौड़ा*॥ १४२॥

तदनन्तर जिनकी भुजाएँ नागराज वासुकिके समान विशाल और मोटी थीं, उन भगवान् श्रीरामने पवनकी प्रेरणासे उमड़े हुए मेघके समान काले और पर्वतके समान ऊँचे शरीरवाले कुम्भकर्णको आक्रमण करते देख रणभूमिमें उससे कहा—॥ १४३॥

‘राक्षसराज! आओ, विषाद न करो। मैं धनुष लेकर खड़ा हूँ। मुझे राक्षसवंशका विनाश करनेवाला समझो। अब तुम भी दो ही घड़ीमें अपनी चेतना खो बैठोगे (मर जाओगे)’॥ १४४॥

‘यही राम हैं’—यह जानकर वह राक्षस विकृत स्वरमें अट्टहास करने लगा और अत्यन्त कुपित हो रणक्षेत्रमें वानरोंको भगाता हुआ उनकी ओर दौड़ा॥ १४५॥

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