भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1960, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1960

महातेजस्वी कुम्भकर्ण समस्त वानरोंके हृदयको विदीर्ण-सा करता हुआ विकृत स्वरमें जोर-जोरसे हँसकर मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर एवं भयंकर वाणीमें श्रीरघुनाथजीसे बोला— 'राम! मुझे विराध, कबन्ध और खर नहीं समझना चाहिये। मैं मारीच और वाली भी नहीं हूँ। यह कुम्भकर्ण तुमसे लड़ने आया है॥ १४६-१४७ ॥

'मेरे इस भयंकर एवं विशाल मुद्गरकी ओर देखो। यह सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ है। मैंने पूर्वकालमें इसीके द्वारा समस्त देवताओं और दानवोंको परास्त किया है॥ १४८ ॥

'मेरे नाक-कान नीचेसे कट गये हैं, ऐसा समझकर तुम्हें मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। इन दोनों अङ्गोंके नष्ट होनेसे मुझे थोड़ी-सी भी पीड़ा नहीं होती है॥

'निष्पाप रघुनन्दन! तुम इक्ष्वाकुवंशके वीर पुरुष हो, अतः मेरे अङ्गोंपर अपना पराक्रम दिखाओ। तुम्हारे पौरुष एवं बल-विक्रमको देख लेनेके बाद ही मैं तुम्हें खाऊँगा'॥ १५० ॥

कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर श्रीरामने उसके ऊपर सुन्दर पंखवाले बहुत-से बाण मारे। वज्रके समान वेगवाले उन बाणोंकी गहरी चोट खानेपर भी वह देवद्रोही राक्षस न तो क्षुब्ध हुआ और न व्यथित ही॥

जिन बाणोंसे श्रेष्ठ सालवृक्ष काटे गये और वानरराज वालीका वध हुआ, वे ही वज्रोपम बाण उस समय कुम्भकर्णके शरीरको व्यथा न पहुँचा सके॥ १५२ ॥

देवराज इन्द्रका शत्रु कुम्भकर्ण जलकी धाराके समान श्रीरामकी बाणवर्षाको अपने शरीरसे पीने लगा और भयंकर वेगशाली मुद्गरको चारों ओरसे घुमाघु माकर उनके बाणोंके महान् वेगको नष्ट करने लगा॥

तदनन्तर वह राक्षस देवताओंकी विशाल सेनाको भयभीत करनेवाले और खूनसे लिपटे हुए उस उग्र वेगशाली मुद्गरको घुमा-घुमाकर वानरोंकी वाहिनीको खदेड़ने लगा॥ १५४ ॥

यह देख भगवान् श्रीरामने वायव्य नामक दूसरे अस्त्रका संधान करके उसे कुम्भकर्णपर चलाया और उसके द्वारा उस निशाचरकी मुद्गरसहित दाहिनी बाँह काट डाली। बाँह कट जानेपर वह राक्षस भयानक आवाजमें चीत्कार करने लगा॥ १५५ ॥

श्रीरघुनाथजीके बाणसे कटी हुर्इ वह बाँह, जो पर्वतशिखरके समान जान पड़ती थी, मुद्गरके साथ ही वानरोंकी सेनामें गिरी। उसके नीचे दबकर कितने ही वानर-सैनिक अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे॥ १५६ ॥

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