श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1961, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो अङ्ग-भङ्ग होने या मरनेसे बचे, वे खिन्नचित्त हो किनारे जाकर खड़े हो गये। उनके शरीरमें बड़ी पीड़ा हो रही थी और वे चुपचाप महाराज श्रीराम और राक्षस कुम्भकर्णके घोर संग्रामको देखने लगे॥ १५७ ॥
वायव्यास्त्रसे एक बाँह कट जानेपर कुम्भकर्ण शिखरहीन पर्वतके समान प्रतीत होने लगा। उसने एक ही हाथसे एक ताड़का वृक्ष उखाड़ लिया और उसे लेकर रणभूमिमें महाराज श्रीरामपर धावा किया॥ १५८ ॥
तब श्रीरामने एक सुवर्णभूषित बाण निकालकर उसे ऐन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसके द्वारा सर्पके समान उठी हुई राक्षसकी दूसरी बाँहको भी वृक्षसहित काट गिराया॥ १५९ ॥
कुम्भकर्णकी वह कटी हुई बाँह पर्वत-शिखरके समान पृथ्वीपर गिरी और छटपटाने लगी। उसने कितने ही वृक्षों, शैलशिखरों, शिलाओं, वानरों और राक्षसोंको भी कुचल डाला॥ १६० ॥
उन दोनों भुजाओंके कट जानेपर वह राक्षस सहसा आर्तनाद करता हुआ श्रीरामपर टूट पड़ा। उसे आक्रमण करते देख श्रीरामने दो तीखे अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उनके द्वारा युद्धस्थलमें उस राक्षसके दोनों पैर भी उड़ा दिये॥ १६१ ॥
उसके दोनों पैर दिशा-विदिशा, पर्वतकी कन्दरा, महासागर, लङ्कापुरी तथा वानरों और राक्षसोंकी सेनाओंको भी प्रतिध्वनित करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १६२ ॥
दोनों बाँहों और पैरोंके कट जानेपर उसने वडवानलके समान अपने विकराल मुखको फैलाया और जैसे राहु आकाशमें चन्द्रमाको ग्रस लेता है, उसी प्रकार वह श्रीरामको ग्रसनेके लिये भयानक गर्जना करता हुआ सहसा उनके ऊपर टूट पड़ा॥ १६३ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णजटित पंखवाले अपने तीखे बाणोंसे उसका मुँह भर दिया। मुँह भर जानेपर वह बोलनेमें भी असमर्थ हो गया और बड़ी कठिनाईसे आर्तनाद करके मूर्च्छित हो गया॥ १६४ ॥
इसके बाद भगवान् श्रीरामने ब्रह्मदण्ड तथा विनाशकारी कालके समान भयंकर एवं तीखा बाण, जो सूर्यकी किरणोंके समान उद्दीप्त, इन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित, शत्रुनाशक, तेजस्वी सूर्य और प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान, हीरे और सुवर्णसे विभूषित सुन्दर पंखसे युक्त, वायु तथा