श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रके वज्र और अशनिके समान वेगशाली था, हाथमें लिया और उस निशाचरको लक्ष्य करके छोड़ दिया॥ १६५-१६६ ॥
श्रीरघुनाथजीकी भुजाओंसे प्रेरित होकर वह बाण अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर वेगसे चला। वह धूमरहित अग्निके समान भयानक दिखायी देता था॥ १६७ ॥
जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका मस्तक काट डाला था, उसी प्रकार उस बाणने राक्षसराज कुम्भकर्णके महान् पर्वतशिखरके समान ऊँचे, सुन्दर गोलाकार दाढ़ोंसे युक्त तथा हिलते हुए मनोहर कुण्डलोंसे अलंकृत मस्तकको धड़से अलग कर दिया॥ १६८ ॥
कुम्भकर्णका वह कुण्डलोंसे अलंकृत विशाल मस्तक प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर आकाशके मध्यमें विराजमान चन्द्रमाकी भाँति निस्तेज प्रतीत होता था॥ १६९ ॥
श्रीरामके बाणोंसे कटा हुआ राक्षसका वह पर्वताकार मस्तक लङ्कामें जा गिरा। उसने अपने धक्केसे सड़कके आस-पासके कितने ही मकानों, दरवाजों और ऊँचे परकोटेको भी धराशायी कर दिया॥ १७० ॥
इसी प्रकार उस राक्षसका विशाल धड़ भी, जो हिमालयके समान जान पड़ता था, तत्काल समुद्रके जलमें गिर पड़ा और बड़े-बड़े ग्राहों, मत्स्यों तथा साँपोंको पीसता हुआ पृथ्वीके भीतर समा गया॥ १७१ ॥
ब्राह्मणों और देवताओंके शत्रु महाबली कुम्भकर्णके युद्धमें मारे जानेपर पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत हिलने लगे और सम्पूर्ण देवता हर्षसे भरकर तुमुल नाद करने लगे॥
उस समय आकाशमें खड़े हुए देवर्षि, महर्षि, सर्प, देवता, भूतगण, गरुड़, गुह्यक, यक्ष और गन्धर्वगण श्रीरामका पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हुए॥ १७३ ॥
कुम्भकर्णके महान् वधसे राक्षसराज रावणके मनस्वी बन्धुओंको बड़ा दुःख हुआ। वे रघुकुलतिलक श्रीरामकी ओर देखकर उसी तरह उच्च स्वरसे रोने-कल्पने लगे, जैसे सिंहपर दृष्टि पड़ते ही मतवाले हाथी चीत्कार कर उठते हैं॥ १७४ ॥
देवसमूहको दुःख देनेवाले कुम्भकर्णका युद्धमें वध करके वानर-सेनाके बीचमें खड़े हुए भगवान् श्रीराम अन्धकारका नाश करके राहुके मुखसे छूटे हुए सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ १७५ ॥