भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1963

भयानक बलशाली शत्रुके मारे जानेसे बहुसंख्यक वानरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके मुख विकसित कमलकी भाँति हर्षोल्लाससे खिल उठे तथा उन्होंने सफलमनोरथ हुए राजकुमार भगवान् श्रीरामकी भूरिभूरि प्रशंसा की॥ १७६ ॥

जो बड़े-बड़े युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुआ था तथा देवताओंकी सेनाको भी कुचल डालनेवाला था, उस महान् राक्षस कुम्भकर्णको रणभूमिमें मारकर रघुनाथजीको वैसी ही प्रसन्नता हुई जैसी वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको हुई थी॥ १७७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७ ॥


* इस श्लोकके बाद कुछ प्रतियोंमें निम्नाङ्कित श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं, जो उपयोगी होनेसे यहाँ अर्थसहित दिये जा रहे हैं—

पुरस्ताद् राघवस्यार्थे गदायुक्तो विभीषणः। अभिदुद्राव वेगेन भ्राता भ्रातरमाहवे॥
विभीषणं पुरो दृष्ट्वा कुम्भकर्णोऽब्रवीदिदम्। प्रहरस्व रणे शीघ्रं क्षत्रधर्मे स्थिरो भव॥
भ्रातृस्नेहं परित्यज्य राघवस्य प्रियं कुरु। अस्मत्कार्यं कृतं वत्स यस्त्वं राममुपागतः॥
त्वमेको रक्षसां लोके सत्यधर्माभिरक्षिता। नास्ति धर्माभिरक्तानां व्यसनं तु कदाचन॥
संतानार्थं त्वमेवैकः कुलस्यास्य भविष्यसि। राघवस्य प्रसादात् त्वं रक्षसां राज्यमाप्स्यसि॥
प्रकृत्या मम दुर्धर्ष शीघ्रं मार्गादपक्रम। न स्थातव्यं पुरस्तान्मे सम्भ्रमान्नष्टचेतसः॥
न वेद्मि संयुगे सक्तः स्वान् परान् वा निशाचर। रक्षणीयोऽसि मे वत्स सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥
एवमुक्तो वचस्तेन कुम्भकर्णेन धीमता। विभीषणो महाबाहुः कुम्भकर्णमुवाच ह॥
गदितं मे कुलस्यास्य रक्षणार्थमरिंदम। न श्रुतं सर्वरक्षोभिस्ततोऽहं राममागतः॥
कृतं तु तन्महाभाग सुकृतं दुष्कृतं तु वा। एवमुक्त्वाश्रुपूर्णाक्षो गदापाणिर्विभीषणः।
एकान्तमाश्रितो भूत्वा चिन्तयामास संस्थितः॥

तब श्रीरामचन्द्रजीके लिये युद्ध करनेके निमित्त गदा हाथमें लिये विभीषण उनके आगे आकर खड़े हो गये और उस युद्धस्थलमें भाई होकर भाईका सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़े। विभीषणको सामने देखकर कुम्भकर्णने इस प्रकार कहा— ‘वत्स ! तुम भाईका स्नेह छोड़कर श्रीरघुनाथजीका प्रिय करो और रणभूमिमें शीघ्र मेरे ऊपर गदा चलाओ। इस समय तुम क्षात्रधर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थिर रहो। तुम जो श्रीरामकी शरणमें आ गये, इससे तुमने हमलोगोंका काम बना दिया। राक्षसोंमें एक तुम्हीं ऐसे हो, जिसने इस जगत्में सत्य और धर्मकी रक्षा की है। जो धर्ममें अनुरक्त होते हैं, उन्हें कभी कोई दुःख नहीं भोगना पड़ता है। अब एकमात्र तुम्हीं इस कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये जीवित रहोगे। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे