श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1958, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसी बीचमें यमराजके समान प्रतीत होनेवाले उस बलवान् एवं भयानक पराक्रमी निशाचरने एक भयंकर पर्वतका शिखर उठाया और उसे घुमाकर श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्य करके चला दिया॥ १२३ ॥
परंतु श्रीरामने पुनः धनुषका संधान करके सीधे जानेवाले सात बाण मारकर उस पर्वत-शिखरको बीचमें ही टूक-टूक कर डाला, अपने पासतक नहीं आने दिया॥
भरतके बड़े भाई धर्मात्मा श्रीरामने सुवर्णभूषित विचित्र बाणोंद्वारा जब उस महान् पर्वतशिखरको काट दिया, उस समय अपनी प्रभासे प्रकाशित-सा होते हुए उस मेरुपर्वतके शृङ्गसदृश शिखरने भूमिपर गिरते-गिरते दो सौ वानरोंको धराशायी कर दिया॥ १२५-१२६ ॥
उस समय धर्मात्मा लक्ष्मणने, जो कुम्भकर्णके वधके लिये नियुक्त थे, उसके वधकी अनेक युक्तियोंका विचार करते हुए श्रीरामसे कहा—॥ १२७ ॥
‘राजन्! यह राक्षस शोणितकी गन्धसे मतवाला हो गया है; अतः न वानरोंको पहचानता है न राक्षसोंको। अपने और पराये दोनों ही पक्षोंके योद्धाओंको खा रहा है॥ १२८ ॥
‘अतः श्रेष्ठ वानर-यूथपतियोंमें जो प्रधान लोग हैं, वे सब ओरसे इसके ऊपर चढ़ जायँ और इसके शरीरपर ही बैठे रहें॥ १२९ ॥
‘ऐसा होनेसे यह दुर्बुद्धि निशाचर इस समय भारी भारसे पीड़ित हो रणभूमिमें विचरण करते समय दूसरे वानरोंको नहीं मार सकेगा’॥ १३० ॥
बुद्धिमान् राजकुमार लक्ष्मणकी यह बात सुनकर वे महाबली वानर-यूथपति बड़े हर्षके साथ कुम्भकर्णपर चढ़ गये॥ १३१ ॥
वानरोंके चढ़ जानेपर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और जैसे बिगड़ैल हाथी महावतोंको गिरा देता है, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक वानरोंको अपनी देह हिलाकर गिरा दिया॥ १३२ ॥
उन सबको गिराया गया देख श्रीरामने यह समझ लिया कि कुम्भकर्ण रुष्ट हो गया है। फिर वे बड़े वेगसे उछलकर उस राक्षसकी ओर दौड़े और एक उत्तम धनुष हाथमें ले लिया॥ १३३ ॥
उस समय उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। वे धीर-वीर श्रीरघुनाथजी उसकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उसे अपनी दृष्टिसे दग्ध कर डालेंगे। उन्होंने कुम्भकर्णके बलसे पीड़ित समस्त वानरयूथपतियोंका हर्ष बढ़ाते हुए बड़े वेगसे उस राक्षसपर धावा किया॥ १३४ ॥