श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘मेरे द्वारा रामके मारे जानेपर जो दूसरे लोग युद्धभूमिमें खड़े रहेंगे, उन सबके साथ मैं अपने संहारकारी बलके द्वारा युद्ध करूँगा’॥ १११ ॥
वह राक्षस जब पूर्वोक्त बात कह चुका, तब सुमित्राकुमार लक्ष्मण रणभूमिमें ठठाकर हँस पड़े और उससे प्रशंसा मिश्रित कठोर वाणीमें बोले— ॥ ११२ ॥
‘वीर कुम्भकर्ण! तुम महान् पौरुष पाकर जो इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी असह्य हो उठे हो, वह तुम्हारा कथन बिलकुल ठीक है, झूठ नहीं है। मैंने स्वयं अपनी आँखोंसे आज तुम्हारा पराक्रम देख लिया। ये रहे दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम, जो पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हैं’॥ ११३ १/२ ॥
लक्ष्मणकी यह बात सुनकर उसका आदर न करते हुए महाबली निशाचर कुम्भकर्णने सुमित्राकुमारको लाँघकर श्रीरामपर ही धावा किया। उस समय वह अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कम्पित-सी किये देता था॥
उसे आते देख दशरथनन्दन श्रीरामने रौद्रास्त्रका प्रयोग करके कुम्भकर्णके हृदयमें अनेक तीखे बाण मारे॥ ११६ ॥
श्रीरामके बाणोंसे घायल हो वह सहसा उनपर टूट पड़ा। उस समय क्रोधसे भरे हुए कुम्भकर्णके मुखसे अङ्गारमिश्रित आगकी लपटें निकल रही थीं॥ ११७ ॥
भगवान् श्रीरामके अस्त्रसे पीड़ित हो राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण घोर गर्जना करता और रणभूमिमें वानरोंको खदेड़ता हुआ क्रोधपूर्वक उनकी ओर दौड़ा॥ ११८ ॥
श्रीरामके बाणोंमें मोरके पंख लगे हुए थे। वे कुम्भकर्णकी छातीमें धँस गये। अतः व्याकुलताके कारण उसके हाथसे गदा छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ११९ ॥
इतना ही नहीं, उसके अन्य सब आयुध भी भूमिपर बिखर गये। जब उसने समझ लिया कि अब मेरे पास कोई हथियार नहीं है, तब उस महाबली निशाचरने दोनों मुक्कों और हाथोंसे ही वानरोंका महान् संहार आरम्भ किया॥ १२० १/२ ॥
बाणोंसे उसके सारे अङ्ग अत्यन्त घायल हो गये थे, इसलिये वह खूनसे नहा उठा और जैसे पर्वत झरने बहाता है, उसी तरह वह अपनी देहसे रक्तकी धारा बहाने लगा॥ १२१ ॥
वह खूनसे लथपथ और दुःसह क्रोधसे व्याकुल होकर वानरों, भालुओं तथा राक्षसोंको भी खाता हुआ चारों ओर दौड़ने लगा॥ १२२ ॥