श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1956, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय शत्रुनगरीपर विजय पाने तथा शत्रुओंका संहार करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण कुपित होकर उस राक्षसके साथ युद्ध करने लगे॥ १०० ॥
उन पराक्रमी लक्ष्मणने कुम्भकर्णके शरीरमें सात बाण धँसा दिये। फिर दूसरे बाण लिये और उन्हें भी उसपर छोड़ दिया॥ १०१ ॥
उनसे पीड़ित हुए उस राक्षसने लक्ष्मणके उस अस्त्रको निःशेष कर दिया। तब सुमित्राके आनन्दको बढ़ानेवाले बलवान् लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ॥ १०२ ॥
उन्होंने कुम्भकर्णके सुवर्णनिर्मित सुन्दर एवं दीप्तिमान् कवचको अपने बाणोंसे ढककर उसी तरह अदृश्य कर दिया, जैसे हवाने संध्याकालके बादलको उखाड़कर अदृश्य कर दिया हो॥ १०३ ॥
काले कोयलेके ढेरकी-सी कान्तिवाला कुम्भकर्ण लक्ष्मणके सुवर्णभूषित बाणोंसे आच्छादित हो मेघोंसे ढके हुए अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पा रहा था॥
तब उस भयंकर राक्षसने मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे सुमित्रानन्दन लक्ष्मणका तिरस्कार करते हुए कहा— ॥ १०५ ॥
‘लक्ष्मण! मैं युद्धमें यमराजको भी बिना कष्ट उठाये ही जीत लेनेकी शक्ति रखता हूँ। तुमने मेरे साथ निर्भय होकर युद्ध करते हुए अपनी अद्भुत वीरताका परिचय दिया है॥ १०६ ॥
‘जब मैं महासमरमें मृत्युके समान हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत होऊँ, उस समय जो मेरे सामने खड़ा रह जाय, वह भी प्रशंसाका पात्र है। फिर जो मुझे युद्ध प्रदान कर रहा हो, उसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ १०७ ॥
‘ऐरावतपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए शक्तिशाली इन्द्र भी पहले मेरे सामने युद्धमें नहीं ठहर सके हैं॥ १०८ ॥
‘सुमित्रानन्दन! तुमने बालक होकर भी आज अपने पराक्रमसे मुझे संतुष्ट कर दिया, अतः मैं तुम्हारी अनुमति लेकर युद्धके लिये श्रीरामके पास जाना चाहता हूँ॥ १०९ ॥
‘तुमने अपने वीर्य, बल और उत्साहसे रणभूमिमें मुझे संतोष प्रदान किया है; इसलिये अब मैं केवल रामको ही मारना चाहता हूँ, जिनके मारे जानेपर सारी शत्रुसेना स्वतः मर जायगी॥ ११० ॥