श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1955, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाकाय राक्षस रक्तसे नहाकर और भी भयानक दिखायी देने लगा। उस निशाचरने पुनः शत्रुके सामने जाकर युद्ध करनेका विचार किया॥ ९० ॥
अमर्षपूर्वक रक्त वमन करता हुआ रावणका छोटा भार्इ कुम्भकर्ण, जिसके शरीरका रंग काले मेघके समान था, संध्याकालके बादलकी भाँति सुशोभित हो रहा था॥
सुग्रीवके निकल भागनेपर वह इन्द्रद्रोही राक्षस फिर युद्धके लिये दौड़ा। उस समय यह सोचकर कि ‘मेरे पास कोर्इ हथियार नहीं है’ उसने एक बड़ा भयंकर मुद्गर ले लिया॥ ९२ ॥
तदनन्तर महाबलशाली राक्षस कुम्भकर्ण सहसा लङ्कापुरीसे निकलकर प्रजाका भक्षण करनेवाली प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्निके समान उस भयंकर वानर-सेनाको युद्धस्थलमें अपना आहार बनाने लगा॥
उस समय कुम्भकर्णको भूख सता रही थी, अतएव वह रक्त और मांसके लिये लालायित हो रहा था। उसने उस भयंकर वानर-सेनामें प्रवेश करके मोहवश वानरों और भालुओंके साथ-साथ राक्षसों तथा पिशाचोंको भी खाना आरम्भ कर दिया। वह प्रधान-प्रधान वानरोंको उसी प्रकार अपना ग्रास बना रहा था, जैसे प्रलयकालमें मृत्यु प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करती है॥ ९४ ॥
वह बड़ी उतावलीके साथ एक हाथसे क्रोधपूर्वक एक, दो, तीन तथा बहुत-बहुत राक्षसों और वानरोंको समेटकर अपने मुँहमें झोंक लेता था॥ ९५ ॥
उस समय वह महाबली निशाचर पर्वत-शिखरोंकी मार खाता हुआ भी मुँहसे वानरोंकी चर्बी और रक्त गिराता हुआ उन सबका भक्षण कर रहा था॥ ९६ ॥
उसके द्वारा खाये जाते हुए वानर भयभीत हो उस समय भगवान् श्रीरामकी शरणमें गये। उधर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो वानरोंको अपना आहार बनाता हुआ सब ओर उनपर धावा करने लगा॥ ९७ ॥
वह सात, आठ, बीस, तीस तथा सौ-सौ वानरोंको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लेता और उन्हें खाता हुआ रणभूमिमें दौड़ता-फिरता था॥ ९८ ॥
उसके शरीरमें मेद, चर्बी और रक्त लिपटे हुए थे। उसके कानोंमें आँतोंकी मालाएँ उलझी हुर्इ थीं तथा उसकी दाढ़ें बहुत तीखी थीं। वह महाप्रलयके समय प्राणियोंका संहार करनेवाले विशाल रूपधारी कालके समान वानरोंपर शूलोंकी वर्षा कर रहा था॥ ९९ ॥