भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2004

सुग्रीव, अङ्गद, नील, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान्, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, नल, ज्योतिर्मुख तथा द्विविद— इन सभी वानरोंको हनुमान् और विभीषणने युद्धमें घायल होकर पड़ा देखा॥ १०-११ ॥

ब्रह्माजीके प्रिय अस्त्र—ब्रह्मास्त्रने दिनके चार भाग व्यतीत होते-होते सरसठ करोड़ वानरोंको हताहत कर दिया था। जब केवल पाँचवाँ भाग—सायाह्नकाल शेष रह गया, तब ब्रह्मास्त्रका प्रयोग बंद हुआ था॥ १२ ॥

समुद्रके समान विशाल एवं भयंकर वानर-सेनाको बाणोंसे पीड़ित देख विभीषणसहित हनुमान्जी जाम्बवान्को ढूँढ़ने लगे॥ १३ ॥

ब्रह्माजीके पुत्र वीर जाम्बवान् एक तो स्वाभाविक वृद्धावस्थासे युक्त थे, दूसरे उनके शरीरमें सैकड़ों बाण धँसे हुए थे; अतः वे बुझती हुई आगके समान निस्तेज दिखायी देते थे। उन्हें देखकर विभीषण तुरंत ही उनके पास गये और बोले—‘आर्य! इन तीखे बाणोंके प्रहारसे आपके प्राण निकल तो नहीं गये?’॥ १४-१५ ॥

विभीषणकी बात सुनकर ऋक्षराज जाम्बवान् बड़ी कठिनाईसे वाक्यका उच्चारण करते हुए इस प्रकार बोले—॥ १६ ॥

‘महापराक्रमी राक्षसराज! मैं केवल स्वरसे तुम्हें पहचान रहा हूँ। मेरे सभी अङ्ग पैने बाणोंसे बिंधे हुए हैं, अतः मैं आँख खोलकर तुम्हें नहीं देख सकता॥ १७ ॥

‘उत्तम व्रतके पालक विभीषण! यह तो बताओ, जिनको जन्म देनेसे अञ्जनादेवी उत्तम पुत्रकी जननी और वायुदेव श्रेष्ठ पुत्रके जनक माने जाते हैं, वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् कहीं जीवित हैं?’॥ १८ ॥

जाम्बवान्का यह प्रश्न सुनकर विभीषणने पूछा— ‘ऋक्षराज! आप दोनों महाराजकुमारोंको छोड़कर केवल पवनकुमार हनुमान्जीको ही क्यों पूछ रहे हैं?॥ १९ ॥

‘आर्य! आपने न तो राजा सुग्रीवपर, न अङ्गदपर और न भगवान् श्रीरामपर ही वैसा स्नेह दिखाया है, जैसा पवनपुत्र हनुमान्जीके प्रति आपका प्रगाढ़ प्रेम लक्षित हो रहा है’॥ २० ॥

विभीषणकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा— ‘राक्षसराज! सुनो। मैं पवनकुमार हनुमान्जीको क्यों पूछता हूँ—यह बता रहा हूँ॥ २१ ॥