श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2005, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘यदि वीरवर हनुमान् जीवित हों तो यह मरी हुई सेना भी जीवित ही है—ऐसा समझना चाहिये और यदि उनके प्राण निकल गये हों तो हमलोग जीते हुए भी मृतकके ही तुल्य हैं॥ २२ ॥
‘तात! यदि वायुके समान वेगशाली और अग्निके समान पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् जीवित हैं तो हम सबके जीवित होनेकी आशा की जा सकती है’॥ २३ ॥
बूढ़े जाम्बवान्के इतना कहते ही पवनपुत्र हनुमान्जी उनके पास आ गये और दोनों पैर पकड़कर उन्होंने विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया॥ २४ ॥
हनुमान्जीकी बात सुनकर उस समय ऋक्षराज जाम्बवान्ने, जिनकी सारी इन्द्रियाँ बाणोंके प्रहारसे पीड़ित थीं, अपना पुनर्जन्म हुआ-सा माना॥ २५ ॥
फिर उन महातेजस्वी जाम्बवान्ने हनुमान्जीसे कहा— ‘वानरसिंह! आओ, सम्पूर्ण वानरोंकी रक्षा करो॥ २६ ॥
‘तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पूर्ण पराक्रमसे युक्त नहीं है। तुम्हीं इन सबके परम सहायक हो। यह समय तुम्हारे ही पराक्रमका है। मैं दूसरे किसीको इसके योग्य नहीं देखता॥ २७ ॥
‘तुम रीछों और वानरवीरोंकी सेनाओंको हर्ष प्रदान करो और बाणोंसे पीड़ित हुए इन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरसे बाण निकालकर इन्हें स्वस्थ करो॥ २८ ॥
‘हनूमन्! समुद्रके ऊपर-ऊपर उड़कर बहुत दूरका रास्ता तै करके तुम्हें पर्वतश्रेष्ठ हिमालयपर जाना चाहिये॥
‘शत्रुसूदन! वहाँ पहुँचनेपर तुम्हें बहुत ही ऊँचे सुवर्णमय उत्तम पर्वत ऋषभका तथा कैलास-शिखरका दर्शन होगा॥ ३० ॥
‘वीर! उन दोनों शिखरोंके बीचमें एक ओषधियोंका पर्वत दिखायी देगा, जो अत्यन्त दीप्तिमान् है। उसमें इतनी चमक है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। वह पर्वत सब प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न है॥ ३१ ॥
‘वानरसिंह! उसके शिखरपर उत्पन्न चार ओषधियाँ तुम्हें दिखायी देंगी, जो अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित किये रहती हैं॥ ३२ ॥
‘उनके नाम इस प्रकार हैं—मृतसञ्जीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी नामक महौषधि॥