श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2006, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘हनुमन्! पवनकुमार! तुम उन सब ओषधियोंको लेकर शीघ्र लौट आओ और वानरोंको प्राणदान देकर आश्वासन दो’॥ ३४ ॥
जाम्बवान्की यह बात सुनकर वायुनन्दन हनुमान्जी उसी तरह असीम बलसे भर गये, जैसे महासागर वायुके वेगसे व्याप्त हो जाता है॥ ३५ ॥
वीर हनुमान् एक पर्वतके शिखरपर खड़े हो गये और उस उत्तम पर्वतको पैरोंसे दबाते हुए द्वितीय पर्वतके समान दिखायी देने लगे॥ ३६ ॥
हनुमान्जीके चरणोंके भारसे पीड़ित हो वह पर्वत धरतीमें धँस गया। अधिक दबाव पड़नेके कारण वह अपने शरीरको भी धारण न कर सका॥ ३७ ॥
हनुमान्जीके भारसे पीड़ित हुए उस पर्वतके वृक्ष उन्हींके वेगसे टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही जल उठे। साथ ही उस पहाड़के चोटियाँ भी ढहने लगीं॥
हनुमान्जीके दबानेपर वह श्रेष्ठ पर्वत हिलने लगा। उसके वृक्ष और शिलाएँ टूट-फूटकर गिरने लगीं; अतः वानर वहाँ ठहर न सके॥ ३९ ॥
लङ्काका विशाल और ऊँचा द्वार भी हिल गया। मकान और दरवाजे ढह गये। समूची नगरी भयसे व्याकुल हो उस रातमें नाचती-सी जान पड़ी॥ ४० ॥
पर्वताकार पवनकुमार हनुमान्जीने उस पर्वतको दबाकर पृथ्वी और समुद्रमें भी हलचल पैदा कर दी॥
तदनन्तर वहाँसे आगे बढ़कर वे मेरु और मन्दराचलके समान ऊँचे मलयपर्वतपर चढ़ गये। वह पर्वत नाना प्रकारके झरनोंसे व्याप्त था॥ ४२ ॥
वहाँ भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताएँ फैली थीं। कमल और कुमुद खिले हुए थे। देवता और गन्धर्व उस पर्वतका सेवन करते थे तथा वह साठ योजन ऊँचा था॥ ४३ ॥
विद्याधर, ऋषि-मुनि तथा अप्सराएँ भी वहाँ निवास करती थीं। अनेक प्रकारके मृगसमूह वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा बहुत-सी कन्दराएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ाती थीं॥ ४४ ॥
पवनकुमार हनुमान्जी वहाँ रहनेवाले यक्ष, गन्धर्व और किन्नर आदि सबको व्याकुल करते हुए मेघके समान बढ़ने लगे॥ ४५ ॥
वे दोनों पैरोंसे उस पर्वतको दबाकर और वडवानलके समान अपने भयङ्कर मुखको फैलाकर निशाचरोंको डराते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ४६ ॥