भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2012, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 2012

योद्धाओंके कवच, हाथी और घोड़ोंके बख्तर, खड्ग, धनुष, प्रत्यञ्चा, बाण, तोमर, अंकुश, शक्ति, रोमज (कम्बल आदि), वालज (चँवर आदि), आसनोपयोगी व्याघ्रचर्म, अण्डज (कस्तूरी आदि), मोती और मणियोंसे जटिल विचित्र महल तथा नाना प्रकारके अस्त्रसमूह— इन सबको सब ओर फैली हुई आग जला रही थी॥

उस समय अग्निदेवने नाना प्रकारके विचित्र गृहोंको दग्ध करना आरम्भ किया। जो घरोंमें आसक्त थे, सोनेके विचित्र कवच धारण किये हुए थे तथा हार, आभूषण और वस्त्रोंसे विभूषित थे, उन सभी राक्षसोंके आवासस्थान आगकी लपटोंमें आ गये॥ १३-१४ ॥

मदिरापानसे जिनके नेत्र चञ्चल हो रहे थे, जो नशेसे विह्वल हो लड़खड़ाते हुए चलते थे, जिनके वस्त्रोंको उनकी प्रेयसी स्त्रियोंने पकड़ रखा था, जो शत्रुओंपर कुपित थे, जिनके हाथोंमें गदा, खड्ग और शूल शोभा पा रहे थे, जो खाने-पीनेमें लगे थे, जो बहुमूल्य शय्याओंपर अपनी प्राणवल्लभाओंके संग शयन कर रहे थे तथा जो आगसे भयभीत हो अपने पुत्रोंको गोदमें लेकर सब ओर तीव्रगतिसे भाग रहे थे, ऐसे लाखों लङ्कानिवासियोंको उस समय अग्निने जलाकर भस्म कर दिया। वह आग वहाँ रह-रहकर पुनः प्रज्वलित हो उठती थी॥ १५—१७ १/२ ॥

जो बहुत मजबूत और बहुमूल्य बने हुए थे, गाम्भीर्य गुणोंसे युक्त थे—अनेकानेक ड्योढ़ियों, परकोटों, आन्तरिक गृहों, द्वारों और उपद्वारोंके कारण दुर्गम प्रतीत होते थे, जो सुवर्णनिर्मित अर्धचन्द्र अथवा पूर्णचन्द्रके आकारमें बने हुए थे, अट्टालिकाओंके कारण बहुत ऊँचे दिखायी देते थे, विचित्र झरोखे जिनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनमें सब ओर सोने-बैठनेके लिये शय्या-आसन आदि सुसज्जित थे, मणियों और मूँगोंसे जटिल होनेके कारण जिनकी विचित्र शोभा हो रही थी, जो अपनी ऊँचाईसे सूर्यदेवका स्पर्श-सा कर रहे थे, जिनमें क्रौञ्च और मोरोंके कलरव, वीणाकी मधुर-ध्वनि तथा भूषणोंकी झनकारें गूँज रही थीं और जो पर्वताकार दिखायी देते थे, उन सभी गृहोंको प्रज्वलित आगने जला दिया॥

आगसे घिरे हुए लङ्काके बाहरी दरवाजे ग्रीष्म-ऋतुमें विद्युन्मालामण्डित मेघसमूहोंके समान प्रकाशित होते थे॥ २१ १/२ ॥

अग्निकी लपटोंमें लिपटे हुए लङ्कापुरीके मकान दावाग्निसे दग्ध होते हुए बड़े-बड़े पर्वतोंके शिखरोंके समान जान पड़ते थे॥ २२ १/२ ॥

सतमहले भवनोंमें सोयी हुई सुन्दरियाँ जब आगसे दग्ध होने लगीं, उस समय सारे आभूषणोंको फेंककर हाय-हाय करती हुई उच्च स्वरसे चीत्कार करने लगीं॥

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