भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2013

वहाँ आगकी लपेटमें आये हुए कितने ही भवन इन्द्रके वज्रके मारे हुए महान् पर्वतोंके शिखरोंके समान धराशायी हो रहे थे॥ २४ १/२ ॥

वे जलते हुए गगनचुम्बी भवन दूरसे ऐसे जान पड़ते थे, मानो हिमालयके शिखर सब ओरसे दग्ध हो रहे हों॥ २५ १/२ ॥

अट्टालिकाओंके जलते हुए शिखर उठती हुई ज्वालाओंसे आवेष्टित हो रहे थे। रात्रिमें उनसे उपलक्षित हुई लङ्कापुरी खिले हुए पलाश-पुष्पोंसे युक्त-सी दिखायी देती थी॥ २६ १/२ ॥

हाथियोंके अध्यक्षोंने हाथियोंको और अश्वाध्यक्षोंने अश्वोंको भी खोल दिया था। वे वहाँ इधर-उधर भाग रहे थे, इससे लङ्कापुरी प्रलयकालमें भ्रान्त होकर घूमते हुए ग्राहोंसे युक्त महासागरके समान प्रतीत होती थी॥

कहीं खुले हुए घोड़ेको देखकर हाथी भयभीत होकर भागता था और कहीं डरे हुए हाथीको देखकर भी घोड़ा भागने लगता था॥ २८ ॥

लङ्कापुरीके जलते समय समुद्रमें आगकी ज्वालाका प्रतिबिम्ब पड़ रहा था, जिससे वह महासागर लाल पानीसे युक्त लालसागरके समान शोभा पाता था॥ २९ ॥

वानरोंद्वारा जिसमें आग लगायी गयी थी, वह लङ्कापुरी दो ही घड़ीमें संसारके घोर संहारके समय दग्ध हुई पृथ्वीके समान प्रतीत होने लगी॥ ३० ॥

धूँएँसे आच्छादित और आगसे संतप्त होकर उच्च स्वरसे आर्तनाद करती हुई लङ्काकी नारियोंका करुण क्रन्दन सौ योजन दूरतक सुनायी देता था॥ ३१ ॥

जिनके शरीर जल गये थे, ऐसे जो-जो राक्षस नगरसे बाहर निकलते, उनके ऊपर युद्धकी इच्छावाले वानर सहसा टूट पड़ते थे॥ ३२ ॥

वानरोंकी गर्जना और राक्षसोंके आर्तनादसे दसों दिशाएँ, समुद्र और पृथ्वी गूँज उठीं॥ ३३ ॥

इधर बाण निकल जानेसे स्वस्थ हुए दोनों भाई महात्मा श्रीराम और लक्ष्मणने बिना किसी घबराहटके अपने श्रेष्ठ धनुष उठाये॥ ३४ ॥

उस समय श्रीरामने अपने उत्तम धनुषको खींचा, उससे भयंकर टंकार प्रकट हुई, जो राक्षसोंको भयभीत कर देनेवाली थी॥ ३५ ॥