भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2014

श्रीरामचन्द्रजी अपने विशाल धनुषको खींचते हुए उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे त्रिपुरासुरपर कुपित हो भगवान् शंकर अपने वेदमय धनुषकी टंकार करते हुए सुशोभित हुए थे॥ ३६॥

वानरोंकी गर्जना तथा राक्षसोंके कोलाहल—इन दोनों प्रकारके शब्दोंसे भी ऊपर उठकर श्रीरामके धनुषकी टंकार सुनायी पड़ती थी॥ ३७॥

वानरोंकी गर्जना, राक्षसोंका कोलाहल और श्रीरामके धनुषकी टंकार—ये तीनों प्रकारके शब्द दसों दिशाओंमें व्याप्त हो रहे थे॥ ३८॥

भगवान् श्रीरामके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा लङ्कापुरीका वह नगरद्वार, जो कैलास-शिखरके समान ऊँचा था, टूट-फूटकर भूतलपर बिखर गया॥ ३९॥

सतमहले मकानों तथा अन्य गृहोंपर गिरते हुए श्रीरामके बाणोंको देखकर राक्षसपतियोंने युद्धके लिये बड़ी भयंकर तैयारी की॥ ४०॥

कमर कसकर और कवच आदि बाँधकर युद्धके लिये तैयार होते तथा सिंहनाद करते हुए उन राक्षसपतियोंके लिये वह रात कालरात्रिके समान प्राप्त हुई थी॥ ४१॥

उस समय महात्मा सुग्रीवने प्रधान-प्रधान वानरोंको यह आज्ञा दी—'वानरवीरो! तुम सब लोग अपने-अपने निकटवर्ती द्वारपर जाकर युद्ध करो॥ ४२॥

'तुमलोगोंमेंसे जो वहाँ-वहाँ युद्धभूमिमें उपस्थित होकर भी मेरे आदेशका पालन न करे—युद्धसे मुँह मोड़कर भाग जाय, उसे तुम सब लोग पकड़कर मार डालना; क्योंकि वह राजाज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाला होगा'॥ ४३॥

सुग्रीवकी इस आज्ञाके अनुसार जब मुख्य-मुख्य वानर जलते मशाल हाथमें लिये नगरद्वारपर जाकर डट गये, तब रावणको बड़ा क्रोध हुआ॥ ४४॥

उसने अँगड़ाई लेकर जो अङ्गोंका संचालन किया, उससे दसों दिशाएँ व्याकुल हो उठीं। वह कालरुद्रके अङ्गोंमें प्रकट हुए मूर्तिमान् क्रोधकी भाँति दिखायी देने लगा॥ ४५॥

क्रोधसे भरे हुए रावणने कुम्भकर्णके दो पुत्र कुम्भ और निकुम्भको बहुत-से राक्षसोंके साथ भेजा॥

रावणकी आज्ञासे यूपाक्ष, शोणिताक्ष, प्रजङ्घ और कम्पन भी कुम्भकर्णके दोनों पुत्रोंके साथ-साथ युद्धके लिये निकले॥ ४७॥