भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2015

उस समय सिंहके समान दहाड़ते हुए रावणने उन समस्त महाबली राक्षसोंको आदेश दिया—‘वीर निशाचरो! इसी रातमें तुमलोग युद्धके लिये जाओ’॥ ४८ ॥

राक्षसराजकी आज्ञा पाकर वे वीर राक्षस हाथोंमें चमकीले अस्त्र-शस्त्र लिये बार-बार गर्जना करते हुए लङ्कापुरीसे बाहर निकले॥ ४९ ॥

राक्षसोंने अपने आभूषणोंकी तथा अपनी प्रभासे और वानरोंने मशालकी आगसे वहाँके आकाशको प्रकाशसे परिपूर्ण कर दिया था॥ ५० ॥

चन्द्रमाकी, नक्षत्रोंकी और उन दोनों सेनाओंके आभूषणोंकी प्रज्वलित प्रभाने आकाशको प्रकाशित कर दिया था॥ ५१ ॥

चन्द्रमाकी चाँदनी, आभूषणोंकी प्रभा तथा प्रकाशमान ग्रहोंकी दीप्तिने सब ओरसे राक्षसों और वानरोंकी सेनाओंको उद्भासित कर रखा था॥ ५२ ॥

लङ्काके अध्जल गृहोंकी प्रभाका जलमें प्रतिबिम्ब पड़नेसे चञ्चल लहरोंवाला समुद्र अधिक शोभा पा रहा था॥ ५३ ॥

राक्षसोंकी वह भयंकर सेना ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित थी। सैनिकोंके हाथोंमें उत्तम खड्ग और फरसे चमक रहे थे। भयानक घोड़े, रथ और हाथियोंसे एवं नाना प्रकारके पैदल सैनिकोंसे वह लैस थी। चमकते हुए शूल, गदा, तलवार, भाले, तोमर और धनुष आदिसे युक्त हुईं वह सेना भयानक विक्रम एवं पुरुषार्थ प्रकट करनेवाली थी॥ ५४-५५ ॥

उस सेनामें भाले चमक रहे थे। सैकड़ों घुँघुरुओंका झंकार सुनायी पड़ता था। सैनिकोंकी भुजाओंमें सोनेके आभूषण बँधे हुए थे। उनके द्वारा फरसे चलाये जा रहे थे, बड़े-बड़े शस्त्र घुमाये जाते थे। धनुषपर बाणोंका संधान किया जाता था। चन्दन, पुष्पमाला और मधुकी अधिकतासे वहाँके महान् वातावरणमें अनुपम गन्ध छा रही थी। वह सेना शूरवीरोंसे व्याप्त तथा महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सिंहनादसे निनादित होनेके कारण भयंकर दिखायी देती थी॥ ५६-५७ ^{१}/_२ ॥

राक्षसोंकी उस दुर्जय सेनाको आती देख वानर-सेना आगे बढ़ी और उच्च स्वरसे गर्जना करने लगी॥

राक्षसोंकी विशाल सेना भी बड़े वेगसे उछलकर शत्रुसेनाकी ओर उसी तरह अग्रसर हुईं, जैसे पतङ्ग आगपर टूट पड़ते हैं॥ ५९ ^{१}/_२ ॥