भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2016

सैनिकोंकी भुजाओंके व्यापारसे जहाँ परिघ और अशनि झूम रहे थे, राक्षसोंकी वह उत्तम सेना बड़ी शोभा पा रही थी॥ ६० १/२ ॥

वहाँ युद्धकी इच्छावाले वानर उन्मत्त-से होकर वृक्षों, पत्थरों और मुक्कोंसे निशाचरोंको मारते हुए उनपर टूट पड़े॥ ६१ १/२ ॥

इसी प्रकार भयानक पराक्रमी निशाचर भी अपने तीखे बाणोंसे सामने आये हुए वानरोंके मस्तक सहसा काट-काटकर गिराने लगे॥ ६२ १/२ ॥

वानरोंने भी दाँतोंसे निशाचरोंके कान काट लिये, मुक्कोंसे मार-मारकर उनके मस्तक विदीर्ण कर दिये और शिलाओंके प्रहारसे उनके अङ्ग-भङ्ग कर दिये। इस अवस्थामें वे राक्षस वहाँ विचर रहे थे॥ ६३ ॥

इसी प्रकार घोर रूपधारी निशाचरोंने भी मुख्य-मुख्य वानरोंको अपनी तीखी तलवारोंसे सर्वथा घायल कर दिया था॥ ६४ ॥

एक वीर जब दूसरे विपक्षी योद्धाको मारने लगता था, तब दूसरा आकर उसे मारने लगता था। इसी प्रकार एकको गिराते हुए योद्धाको दूसरा आकर धराशायी कर देता था। एककी निन्दा करनेवालेकी दूसरा निन्दा करता और एकको दाँतसे काटनेवालेको दूसरा आकर काट लेता था॥ ६५ ॥

एक आकर कहता कि ‘मुझे युद्ध प्रदान करो’ तो दूसरा उसे युद्धका अवसर देता था; फिर तीसरा कहता था कि ‘तुम क्यों क्लेश उठाते हो? मैं इसके साथ युद्ध करता हूँ।’ इस तरह वे एक-दूसरेसे बातें करते थे॥

उस समय वानरों और राक्षसोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा। हथियार गिर जाते, कवच और अस्त्र-शस्त्र छूट जाते, बड़े-बड़े भाले ऊँचे उठे दिखायी देते तथा मुक्कों, शूलों, तलवारों और भालोंकी मार होती थी। उस युद्धस्थलमें राक्षस दस-दस या सात-सात वानरोंको एक साथ मार गिराते थे और वानर भी दस-दस या सात-सात राक्षसोंको एक साथ धराशायी कर देते थे॥ ६७-६८ १/२ ॥

राक्षसोंके वस्त्र खुल गये, कवच और ध्वज टूट गये तथा उस राक्षसी सेनाको रोककर वानरोंने सब ओरसे घेर लिया॥ ६९ ॥