श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके बाणोंके मार्गमें आनेपर वे महामनस्वी वानर-यूथपति आगे बढ़ना तो दूर रहा उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं पाते थे। ठीक उसी तरह, जैसे महासागर अपनी तटभूमिको लाँघकर आगे नहीं जा सकता था॥ ६३ ॥
उन सब वानरसमूहोंको कुम्भकी बाणवर्षासे पीड़ित देख वानरराज सुग्रीवने अपने भतीजे अङ्गदको पीछे करके स्वयं ही रणभूमिमें कुम्भकर्णकुमारपर उसी तरह धावा किया, जैसे पर्वतके शिखरपर विचरनेवाले हाथीके ऊपर वेगवान् सिंह आक्रमण करता है॥ ६४-६५ ॥
महाकपि सुग्रीव अश्वकर्ण आदि बड़े-बड़े वृक्ष तथा दूसरे भी नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर उस राक्षसपर फेंकने लगे॥ ६६ ॥
वृक्षोंकी वह वर्षा आकाशको आच्छादित किये देती थी। उसे टालना अत्यन्त कठिन हो रहा था; किंतु श्रीमान् कुम्भकर्णने अपने तीखे बाणोंसे उन सब वृक्षोंको काट डाला॥ ६७ ॥
लक्ष्य बेधनेमें सफल, तीव्र वेगशाली कुम्भके पैने बाणोंसे व्याप्त हुए वे वृक्ष भयानक शतघ्नियोंके समान सुशोभित होते थे। उस वृक्ष-वृष्टिको कुम्भके द्वारा खण्डित हुईं देख महान् शक्तिशाली पराक्रमी वानरराज सुग्रीव व्यथित नहीं हुए॥ ६८ १/२ ॥
वे उसके बाणोंकी चोट खाते और सहते हुए सहसा उछलकर उसके रथपर चढ़ गये और कुम्भके इन्द्र-धनुषके समान तेजस्वी धनुषको छीनकर उन्होंने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। तत्पश्चात् वे शीघ्र ही वहाँसे नीचे कूद पड़े। यह दुष्कर कर्म करनेके पश्चात् उन्होंने टूटे दाँतवाले हाथीके समान कुम्भसे कुपित १२५ होकर कहा— ॥ ६९-७० १/२ ॥
‘निकुम्भके बड़े भाईं कुम्भ! तुम्हारा पराक्रम और तुम्हारे बाणोंका वेग अद्भुत है। राक्षसोंके प्रति विनय अथवा प्रवणता तथा प्रभाव या तो तुममें है या रावणमें। तुम प्रह्लाद, बलि, इन्द्र, कुबेर और वरुणके समान हो॥
‘केवल तुमने ही अपने अत्यन्त बलशाली पिताका अनुसरण किया है। जैसे जितेन्द्रिय पुरुषको मानसिक व्यथाएँ अभिभूत नहीं करती हैं, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले एकमात्र शूलधारी तुझ महाबाहु वीरको ही देवतालोग युद्धमें परास्त नहीं कर पाते हैं। महामते! पराक्रम प्रकट करो और अब मेरे बलको भी देखो॥ ७३-७४ ॥
‘तुम्हारा पितृव्य रावण केवल वरदानके प्रभावसे देवताओं और दानवोंका वेग सहन करता है। तुम्हारा पिता कुम्भकर्ण अपने बल-पराक्रमसे देवताओं और असुरोंका सामना करता था (परंतु तुम वरदान और पराक्रम दोनोंसे सम्पन्न हो)॥ ७५ ॥