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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2024

‘तुम धनुर्विद्यामें इन्द्रजित्के समान और प्रतापमें रावणके तुल्य हो। राक्षसोंके संसारमें अब बल और पराक्रमकी दृष्टिसे केवल तुम्हीं श्रेष्ठ हो॥ ७६ ॥

‘आज सब प्राणी रणभूमिमें इन्द्र और शम्बरासुरकी भाँति मेरे साथ तुम्हारे अद्भुत महायुद्धको देखें॥ ७७ ॥

‘तुमने वह पराक्रम किया है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। तुमने अपना अस्त्र-कौशल दिखा दिया। तुम्हारे साथ युद्ध करके ये भयंकर पराक्रमी वानर वीर धराशायी हो गये॥ ७८ ॥

‘वीर! अबतक जो मैंने तुम्हारा वध नहीं किया है, उसमें कारण है लोगोंके उपालम्भका भय—लोग यह कहकर मेरी निन्दा करते कि कुम्भ बहुत-से वीरोंके साथ युद्ध करके थक गया था, उस दशामें सुग्रीवने उसे मारा है; अतः अब तुम कुछ विश्राम कर लो, फिर मेरा बल देखो’॥ ७९ ॥

सुग्रीवके इस अपमानयुक्त वचनद्वारा सम्मानित हो घीकी आहुति पाये हुए अग्निदेवके समान कुम्भका तेज बढ़ गया॥ ८० ॥

फिर तो कुम्भने सुग्रीवको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़ लिया। तत्पश्चात् वे दोनों वीर मदमत्त गजराजोंकी भाँति बारंबार लंबी साँस खींचते हुए एक-दूसरेसे गुँथ गये। दोनों दोनोंको रगड़ने लगे और दोनों ही अपने मुखसे परिश्रमके कारण धूमयुक्त आगकी ज्वाला-सी उगलने लगे॥ ८१-८२ ॥

उन दोनोंके पैरोंके आघातसे धरती नीचेको धँसने लगी। झूमती हुई तरङ्गोंसे युक्त वरुणालय समुद्रमें ज्वार-सा आ गया॥ ८३ ॥

इतनेहीमें सुग्रीवने कुम्भको उठाकर बड़े वेगसे समुद्रके जलमें फेंक दिया। उसमें गिरते ही कुम्भको समुद्रका निचला तल देखना पड़ा॥ ८४ ॥

कुम्भके गिरनेसे बड़ी भारी जलराशि ऊपरको उठी, जो विन्ध्य और मन्दराचलके समान जान पड़ी और सब ओर फैल गयी॥ ८५ ॥

इसके बाद कुम्भ पुनः उछलकर बाहर आया और क्रोधपूर्वक सुग्रीवको पटककर उनकी छातीपर उसने वज्रके समान मुक्केसे प्रहार किया॥ ८६ ॥

इससे वानरराजका कवच टूट गया और छातीसे खून बहने लगा। उसका महान् वेगशाली मुक्का सुग्रीवकी हड्डियोंपर बड़े वेगसे लगा था॥ ८७ ॥