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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2078

उन्होंने अत्यन्त कुपित हो अपनी शीघ्र अस्त्र-संचालनकी कलाका प्रदर्शन करते हुए उन समस्त राक्षसोंको प्रत्येकके शरीरमें तीन-तीन बाण मारकर घायल कर दिया तथा राक्षसराजके पुत्र इन्द्रजित्को भी अपने बाण-समूहोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी॥ २५ ॥

शत्रुहन्ता प्रबल शत्रुके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर इन्द्रजित्ने लक्ष्मणपर लगातार बहुत बाण बरसाये॥ २६ ॥

परंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा लक्ष्मणने अपने पासतक पहुँचनेसे पहले ही उन बाणोंको अपने तीखे सायकोंद्वारा काट डाला और रणभूमिमें रथी इन्द्रजित्के सारथिका मस्तक भी झुकी हुई गाँठवाले भल्लसे उड़ा दिया॥ २७ १/२ ॥

सारथिके न रहनेपर भी वहाँ उसके घोड़े व्याकुल नहीं हुए। पूर्ववत् शान्तभावसे रथको ढोते रहे और विभिन्न प्रकारके पैंतरे बदलते हुए मण्डलाकार गतिसे दौड़ लगाते रहे। वह एक अद्भुत-सी बात थी॥ २८ १/२ ॥

सुदृढ़ पराक्रमी सुमित्राकुमार लक्ष्मण अमर्षके वशीभूत हो रणक्षेत्रमें उसके घोड़ोंको भयभीत करनेके लिये उन्हें बाणोंसे बेधने लगे॥ २९ १/२ ॥

रावणकुमार इन्द्रजित् युद्धस्थलमें लक्ष्मणके इस पराक्रमको नहीं सह सका। उसने उन अमर्षशील सुमित्राकुमारको दस बाण मारे॥ ३० १/२ ॥

उसके वे वज्रतुल्य बाण सर्पके विषकी भाँति प्राणघाती थे, तथापि लक्ष्मणके सुनहरी कान्तिवाले कवचसे टकराकर वहीं नष्ट हो गये॥ ३१ ॥

लक्ष्मणका कवच* अभेद्य है, ऐसा जानकर रावणकुमार इन्द्रजित्ने उनके ललाटमें सुन्दर पंखवाले तीन बाण मारे। उसने अपनी अस्त्र चलानेकी फुर्ती दिखाते हुए अत्यन्त क्रोधपूर्वक उन्हें घायल कर दिया। ललाटमें धँसे हुए उन बाणोंसे युद्धकी श्लाघा रखनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण संग्रामके मुहानेपर तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान शोभा पा रहे थे॥ ३२-३३ १/२ ॥

उस राक्षसके द्वारा युद्धमें बाणोंसे इस प्रकार पीड़ित किये जानेपर भी लक्ष्मणने उस समय तुरंत पाँच बाणोंका संधान किया और धनुषको खींचकर चलाये हुए उन बाणोंके द्वारा सुन्दर कुण्डलोंसे सुशोभित इन्द्रजित्के मुखमण्डलको क्षत-विक्षत कर दिया॥ ३४-३५ ॥

लक्ष्मण तथा इन्द्रजित् दोनों वीर महाबलवान् थे। उनके धनुष भी बहुत बड़े थे। भयंकर पराक्रम करनेवाले वे दोनों योद्धा एक-दूसरेको बाणोंसे घायल करने लगे॥ ३६ ॥